Tue. Feb 25th, 2020

 सीधी बात : शरणार्थी ‘ इन ’, घुसपैठिए ‘आउट ’

संजय पुरबिया

लखनऊ।
मोदी सरकार ने पहले लोकसभा और फि र राज्यसभा में विपक्षी पार्टियों के विरोध के बीच नागरिकता संशोधन बिल यानी (कैब) को मंजूरी दिलाने में सफ लता हासिल की। इसके बाद राष्टï्रपति रामनाथ कोविंद की मंजूरी मिलते ही इस बिल ने कानून की शक्ल ले ली और नागरिकता संशोधन कानून यानी (सीएए) बन गया। इससे पहले कि इस बिल के तहत मोदी सरकार आगे की कार्रवाई शुरू कर पाती, असम का विरोध बगावत का शक्ल अख्तियार कर चुका था। बंगाल भी इस विरोध की चपेट में आ गया और अब इस बिल के खिलाफ हो रहा विरोध दिल्ली के जामिया से होते हुए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और लखनऊ के नदवा कॉलेज तक जा पहुंचा। खास बात ये है कि इन सभी जगहों के विरोध एक जैसे नहीं हैं। हर कोई अलग- अलग सोच के साथ विरोध करने सडक़ पर उतरा।

असम में लोगों को डर था कि बाहर के लोग वहां बसकर उनका हक छीन लेंगे, तो जामिया एएएमयू और नदवा कॉलेज में इस बात को लेकर प्रदर्शन हो रहा है कि मुस्लिमों की नागरकिता खतरे में है। जब केन्द्र के किसी फैसले को लेकर आग पूरे देश में लगा हो तो उससे यूपी कैसे अछूता रह सकता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बेहद समझदारी से फैसला लेते हुये ना सिर्फ ‘अफवाहों’ और ‘नासमझी’ की आग में झुलसने वाले यूपी को बचाया बल्कि अवाम के दिलो-दिमाग में ‘कैब’ और ‘सीएए’ के प्रति बनी गलतफहमी को दूर कराने में कामयाब रहें। सभी मंत्रियों को अपने-अपने विधान सभा क्षेत्र में जाकर ‘कैब’ और ‘सीएए’ का असल मंत्र क्या है इसे बताने के काम में लगा दिया। काबिना मंत्रियों ने इसे एक मिशन के तौर पर लिया और पूरी जिम्मेदारी के साथ अपने निर्धारित कार्यक्रमों में जाकर लोगों को समझाया जिसमें वे पूरी तरह से कामयाब रहें। दूसरी तरफ विपक्ष अभी भी अड़ा है कि वे इसे स्वीकार नहीं करेंगे लेकिन सूबे में सभी धर्म के लोगों की एक ही आवाज है, गर्व से कहिए हम सब भारतीय हैं…

सीएए और कैब को लेकर देशभर में तोडफ़ोड़ के साथ-साथ लोगों ने हिंसक रूप ले चुका है। कई राज्यों में कैब को हौव्वा बनाकर राजनीतिक दलों ने लोगों को गुमराह करने का काम किया और नासमझ लोगों ने कई करोड़ की सरकारी सम्पत्तियों के साथ-साथ अपने ही लोगों को मानसिक और शारीरिक चोट पहुंचायी। कैब का विकराल रूप कई राज्यों से होते हुये उत्तर प्रदेश में पहुंचा तो यहां भी कई वर्ग के लोगों ने धरना-प्रदर्शन के बाद आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया। लेकिन, अधिसंख्य प्रदर्शनकारियों से पूछा गया कि आखिर इतना उग्र क्यों हो? किस बात की नाराजगी है और हाथों में कैब लिखी तख्तियां लेकर क्यों निकल पड़े अपने ही शहर के सीने को छलनी करनें? किसी के पास जवाब नहीं था क्योंकि भीड़ में किसी को नहीं मालूम की आखिर कैब है क्या और इससे उन्हें क्या नुकसान हो रहा है…।
एक बात तो साफ है कि लोगों को नागरिकता संशोधन कानून और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन सही से समझ नहीं आया है। जिसकी वजह से तमाम तरह के भ्रम फैल रहे हैं। ऐसे में ये समझना बहुत जरूरी है कि कैब क्या है और एनआरसी क्या है।

राजनैतिक सलाहकारों का कहना है कि नागरिकता संशोधन बिल के तहत कुछ खास देशों से नागरिकों को भारत की नागरिकता देने के प्रावधान में ढील दी गई है। आइए जानते हैं इस बिल के बारे में सब कुछ बातें। नागरिकता संशोधन बिल के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ गानिस्तान के अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता दी जा सकेगी। इस बिल के तहत कोई भी हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई समुदाय के शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने के नियमों में ढील देने का प्रावधान है। इन अल्पसंख्यक लोगों को नागरिकता उसी सूरत में मिलेगी, अगर इन तीनों देशों में किसी अल्पसंख्यक का

धार्मिक आधार पर उत्पीडऩ हो रहा हो,अगर आधार धार्मिक नहीं है, तो वह इस नागरिकता कानून के दायरे में नहीं आएगा। इसी तरह,मुस्लिम धर्म के लोगों को इस कानून के तहत नागरिकता नहीं दी जाएगी, क्योंकि इन तीनों ही देशों में मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं हैं, बल्कि बहुलता में हैं। मुस्लिमों को इसमें शामिल ना करने के पीछे मोदी सरकार का ये तर्क है कि इन तीनों ही देशों में मुस्लिमों की बहुलता के चलते वहां धार्मिक आधार पर किसी मुस्लिम का उत्पीडऩ नहीं हो सकता। इस बिल के तहत किसी अल्पसंख्यक को भारत की नागरिकता पाने के लिए कम से कम 6 तक भारत में रहना जरूरी है। नागरिकता संशोधन कानून के तहत बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफ ग़ानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत में आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है।

जिस तरह अभी पूरे देश में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ लोग गुमराह होकर विरोध कर रहे हैं, वैसे ही नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन लागू होने के दौरान भी हो रहा था। विरोध में अधिकतर लोग दूसरों की बातों पर भरोसा कर के हाथों में झंडे और कई बार पत्थर तक उठा ले रहे थे। आइये, समझें कि एनआरसी क्या है, जिसे सीएबी से जोड़ते हुए विरोध के स्वर बुलंद किए जा रहे हैं। एनआरसी से यह पता चलता है कि कौन भारत का नागरिक है और कौन नहीं। सीधी सी बात है कि जो इसमें शामिल नहीं हैं और देश में रह रहे हैं उन्हें अवैध नागरिक माना जाता है। एनआरसी के तहत उन लोगों को भारत का नागरिक माना जाता है जो 25 मार्च 1971 से पहले से असम में रह रहे हैं। जो लोग उसके बाद से असम में रह रहे हैं या फि र जिनके पास 25 मार्च 1971 से पहले से असम में रहने के सबूत नहीं हैं, उन्हें एनआरसी लिस्ट से बाहर कर दिया गया है। एनआरसी लागू करने का मुख्य उद्देश्य ही यही है कि अवैध नागरिकों की पहचान कर के या तो उन्हें वापस भेजा जाये या फि र जिन्हें मुमकिन हो उन्हें भारत की नागरिकता देकर वैध बनाया जाये।

एनआरसी की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि 1971 के दौरान बांग्लादेश से बहुत सारे लोग भारतीय सीमा में घुस गए थे। ये लोग अधिकतर असम और पश्चिम बंगाल में घुसे थे। ऐसे में ये जरूरी हो जाता है कि जो घुसपैठिए हैं, उनकी पहचान कर के उन्हें बाहर निकाला जाये।नागरिकता संशोधन बिल के सामने आने के बाद से तरह- तरह की बहस हो रही हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि ये एनआरसी का उल्टा है तो ममता बनर्जी जैसे लोग कह रही हैं इसे लाया ही इसलिए गया है ताकि एनआरसी को लागू करना आसान हो जाये। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सवाल ये है कि आखिर इन दोनों में अंतर क्या है और किस बात को लेकर पूरा बवाल मचा हुआ है।

बता दें कि नागरिकता संशोधन कानून में एक विदेशी नागरिक को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है, जबकि एनआरसी का मकसद उन लोगों की पहचान करना है जो भारत के नागरिक नहीं हैं, लेकिन भारत में ही रह रहे हैं। सीएबी के तहत 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी लोगों को नागरिकता देने के नियमों में ढील दी गयी है, जबकि एनआरसी के तहत 25 मार्च 1971 से पहले से भारत में रह रहे लोगों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है।

प्रदर्शन कर रहे लोग कह रहे हैं कि नागरिकता संशोधन कानून में मुस्लिमों को शामिल क्यों नहीं किया गया है? उनका आरोप है कि ये सरकार मुस्लिमों की नागरिकता छीनना चाहती है। कहा जा रहा है कि मोदी सरकार एनआरसी से बाहर हुए हिंदुओं और अन्य धर्मों के लोगों को नागरिकता संशोधन कानून के तहत नागरिकता दे देगी, जबकि उसमें शामिल मुस्लिमों को देश से बाहर निकाल देगी। सही कहा गया है कि अधकचरा ज्ञान इंसान को सिर्फ बर्बादी की कगार तक पहुंचाता है और कैब और सीएए के अधकचरा ज्ञान ने राजनीति में धुरंधर विरोधियों को एक मुद्दा थमा दिया। विरोधियों ने हवा फैला दी कि यदि कैब के आने से हिन्दुस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों को बाहर का रास्ता दिखाया जायेगा।

हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं, बल्कि अधिसंख्य अल्पसंख्यकों को इससे कोई वास्ता ही नहीं रहा,वे अपने-अपने काम में मशगुल रहें। दूसरी तरफ,मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तोडफ़ोड़ और आगजनी करने वालों के खिलाफ जिस तरह से सख्ती भरा तेवर अख्तियार किया उससे ना सिर्फ यूपी आग में जलने से बच गयी बल्कि दंगाईयों के होश फाख्ता हो गये। आज आलम यह है कि मुख्यमंत्री के यहां दंगाईयों की पैरवी तक की जा रही है कि उन्हें बख्श दिया जाये, क्योंकि शासन की ओर से दंगाईयों को चिन्हित कर उन्हें सरकारी धन का नुकसान करने के एवज में भारी भरकम वसूली की रकम की नोटिस भेजी गयी है।

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