Tue. Feb 25th, 2020

ये सम्मान मेरा नहीं बल्कि सभी का है : मोहम्मद शरीफ

फैजाबाद के चच्चा उर्फ मोहम्मद शरीफ को मिला पद्म श्री सम्मान

ये सम्मान मेरा नहीं बल्कि सभी का है : मोहम्मद शरीफ

संजय पुरबिया

फैजाबाद। उम्र 80 वर्ष,3000 हिन्दू,25000 से अधिक मुस्लिम शवों का अंतिम संस्कार करने वाले फैजाबाद के सभी के दुलारे चच्चा मोहम्मद शरीफ को सरकार ने पद्म श्री सम्मान से सम्मानित कर सिर्फ इंसानियत को ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के पूरे अवाम को सम्मानित किया है। इन पर जुल्मों का पहाड़ टूटा लेकिन हौसला बुलंद रहा,इंसानियत की मिसालें पेश करते रहें और आज फैजाबाद के साथ-साथ मुल्क के मसीहा बन गये हैं। द संडे व्यूज़ से खास बातचीत में सभी के दुलारे चच्चा उर्फ मोहम्मद शरीफ ने खुलकर बात की और पद्म श्री पर उन्होंने कहा कि देश में इंसानियत जिंदा रहे और ये पुरस्कार मेरा नहीं बल्कि सभी का सम्मान है।

साइकिल मिस्त्री से लावारिस लाशों के मसीहा बने मोहम्मद शरीफ के जीवन का सफ र बेहद दर्दनाक है। समाजसेवा के क्षेत्र में पद्मश्री से विभूषित किये जाने की घोषणा से बेखबर मोहम्मद शरीफ महिला चिकित्सालय में स्थित एक मजार के पास शनिवार की देर शाम श्रमदान करते मिले। 27 वर्ष पहले सुलतानपुर कोतवाली के तत्कालीन इंस्पेक्टर की ओर से एक तफ्तीश उनके घर पहुंची तो उनका सारा संसार ही उजड़ गया। दरअसल, दवा लेने एक माह पहले गया उनका पुत्र रेलवे ट्रैक पर लावारिस हालत में मृत मिला था। पहने हुए कपड़ों से उसकी पहचान मोहम्मद शरीफ के पुत्र मोहम्मद रईस खान के रूप में हुई। इस हृदय विदारक घटना ने उन्हें इस कदर तो? दिया कि उन्होंने लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार करने का मन बना लिया जो सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है।

जिले में चचा के नाम से मशहूर लगभग 80 वर्षीय मोहम्मद शरीफ अब तक तीन हजार से अधिक हिन्दू और 2500 से अधिक मुस्लिम शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं। कहते हैं कि कोई भी हो, इस दुनिया में लावारिस नहीं होना चाहिये। यही वजह है कि खुद ही शव को लेकर उसके अंतिम संस्कार के लिए निकल जाते हैं। खास बात यह है कि हिन्दू शव को हिन्दू परम्परा से मुखाग्नि देते हैं तो मुस्लिम शवों को इस्लाम के अनुसार ही दफ नाते हैं।

एडवोकेट प्रेम शरण श्रीवास्तव ने बताया कि हम सभी मोहम्मद शरीफ को प्रेम से चच्चा शब्द से ही सम्बोधित करते हैं। चच्चा को लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के लिये नगर निगम से प्रति माह महज 15 रूपए की आर्थिक सहायता मिलती है। जबकि प्रति माह सात लावारिस शव हिन्दू का वह जलाते हैं। उन्होंने बताया कि बाकी रूपयों की जरूरत शहर के मानिंद शख्सियतों के आर्थिक सहयोग से पूरी हो जाती है।

श्री श्रीवास्तव ने बताया कि मोहम्मद शरीफ चच्चा के चार पुत्र थे। एक पुत्र मोहम्मद रईस को सुलतानपुर में खो चुके मोहम्मद शरीफ के दूसरे पुत्र नियाज की हृदयगति रूकने से मौत हो चुकी है। एक स्कूल की गाड़ी चलाने वाला मोहम्मद शगीर अकेले परिवार के साथ रहते हैं। जबकि मोहम्मद जमील उनके साथ ही रहते हैं। ह्दय विदारक यह भी है कि नियाज की मौत के बाद उनकी चार पुत्रियों की देखभाल भी चच्चा शरीफ ही कर रहे हैं।

सबसे दुखद बात तो ये है कि जिले में लावारिस लाशों के मसीहा के रुप में मशहूर मोहम्मद शरीफ आज भी किराये के मकान में जीवन यापन कर रहे हैं। उनका मकान भी बेहद जर्जर और टीन शेड का है। कहते हैं कि किसी तरह जीवन बीता लेंगे लेकिन यह काम नहीं छोड़ेंगे। श्री श्रीवास्तव ने बताया कि सरकार को भी चच्चा की आर्थिक मदद करनी चाहिये ताकि वे और उनके परिजन आराम से जीवन यापन कर सकें।पद्मश्री की घोषणा से मोहम्मद शरीफ बेखबर दिखे। खबर होने पर चच्चा ने कहा कि यह मेरा नहीं बल्कि सभी का सम्मान है। लावारिस लाशों का कोई नहीं होता, यदि इसकी परवाह होने लगे तो कम से कम कोई लावारिस नहीं मरेगा।

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