योग: शारीरिक औऱ मानसिक व्याधियों से मुक्ति का मार्ग

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 लेखक- विजय विक्रम सिंह
सदस्य,पूर्वांचल विकास बोर्ड

लखनऊ।आचार्य रजनीश ने लिखा है कि महाकवि सुमित्रानंदन पंत ने मुझसे एक बार पूछा कि भारत के धर्माकाश में वे कौन बारह लोग हैं, मेरी दृष्टि में, जो सबसे चमकते हुये सितारे हैं ? मैंने उन्हें यह सूची दी,कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, नागार्जुन, शंकर, गोरख, कबीर, नानक, मीरा, रामकृष्ण, कृष्णमूर्ति। सुमित्रानंदन पंत ने आंखें बंद कर ली, सोच में पड़ गये। सूची बनानी आसान भी नहीं है, क्योंकि भारत का आकाश बड़े नक्षत्रों से भरा है! किसे छोड़ो, किसे गिनो …। पंत जी बहुत प्यारे व्यक्ति थे। अति कोमल, अति माधुर्यपूर्ण, वृद्धावस्था तक भी उनके चेहरे पर वैसी ही ताजगी बनी रही, जैसी बनी रहनी चाहिये। वे सुंदर से सुंदरतर होते गये थे। मैं उनके चेहरे पर आते-जाते भाव पढऩे लगा। उन्हें अड़चन भी हुई थी। कुछ नाम, जो स्वभावत: होने चाहिये थे, नहीं थे। राम का नाम नहीं था! उन्होंने आंख खोली और मुझसे कह कि राम का नाम छोड़ दिया है आपने! मैंने कहा, मुझे बारह की ही सुविधा हो चुनने की, तो बहुत नाम छोडऩे पड़े।

फिर मैंने बारह नाम ऐसे चुने हैं जिनकी कुछ मौलिक देन है। उन्होंने फि र मुझसे पूछा कि तो फि र ऐसा करें, सात नाम मुझे दें ? अब बात और कठिन हो गयी थी। मैंने उन्हें सात नाम दिये- कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, शंकर, गोरख, कबीर…। उन्होंने कहा कि आपने जो पांच छोड़े, अब किस आधार पर छोड़े हैं? मैंने कहा कि नागार्जुन बुद्ध में समाहित हैं, जो बुद्ध में बीज-रूप था, उसी को नागार्जुन ने प्रगट किया है। नागार्जुन छोड़े जा सकते हैं और जब बचाने की बात हो तो वृक्ष छोड़े जा सकते हैं, बीज नहीं छोड़े जा सकते। क्योंकि बीजों से फि र वृक्ष हो जायेंगे, नये वृक्ष हो जायेंगे। जहां बुद्ध पैदा होंगे वहां सैकड़ों नागार्जुन पैदा हो जायेंगे, लेकिन कोई नागार्जुन बुद्ध को पैदा नहीं कर सकता। बुद्ध तो गंगोत्री हैं, नागार्जुन तो फि र गंगा के रास्ते पर आये हुये एक तीर्थस्थल हैं! मगर अगर छोडऩा हो तो तीर्थस्थल छोड़े जा सकते हैं, गंगोत्री नहीं छोड़ी जा सकती। ऐसे ही कृष्णमूर्ति भी बुद्ध में समा जाते हैं। कृष्णमूर्ति बुद्ध का नवीनतम संस्करण हैं और नूतनतम भी आज की भाषा में। पर भाषा का ही भेद है,बुद्ध का जो परम सूत्र था। अप्प दीपो भव, कृष्णमूर्ति बस उसकी ही अनुकृति हैं।

यहां ख़ास बात यह है कि ओशो हर बार योगाचार्यों के नाम ले रहे हैं। कृष्ण 16 कलाओं से युक्त थे, पर उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनका योगिराज होना है। जिसमें विश्व की समस्त कलाएं समाहित हों, वह योगियों का राजा तो होगा ही। इसी तरह भारतीय मनीषा में पतंजलि को योग को समग्र रूप से प्रस्तुत करने वाला माना गया है। बुद्ध और महाबीर को सदैव ध्यानस्थ दिखाया गया है। शंकर, गोरख, कबीर, नानक, मीरा और कृष्णमूर्ति आदि सभी को योगी बताया गया गया है। शंकर शास्त्रज्ञ थे पर योगी भी थे। वे योग माया से अपने शरीर को ध्यानस्थ कर मंडन मिश्र की पत्नी को पराजित करने हेतु प्रकृति में व्याप्त काम को सीखने जाते हैं। गोरख, कबीर और मीरा आदि भी योगी हैं। योगी का एक अर्थ है, निरासक्त रह कर संसार को जीना। अर्थात् संसार में हैं, किंतु किसी चीज़ के प्रति आसक्ति नहीं हैं। गीता में तो भगवान कृष्ण ने कहा ही है कि कर्मन्ये वा धिकारस्ते माफ लेषु कदाचन! अर्थात् बिना फ ल की इच्छा किए अपने कर्म में रत रहना।एक योगी की सच्ची पहचान यही है। शायद इसीलिए ओशो ने अपने हर चयन में योगियों को ही भारतीय धर्माकाश के चमकते सितारे बताया। भारत में योगियों का महिमा मंडन भी खूब हुआ है। क्योंकि त्याग यहां योगियों की सर्वोच्च उपलब्धि है। त्याग माया से, मोह से, संग्रह से और व्याधियों से भी। मगर इन सबसे त्याग तब ही संभव है, जब हम योग को धारण करें, योग सिर्फ पेट फु लाना या पिचकाना नहीं है, अपितु योग शरीर और मस्तिष्क को योग्य बनाना है। इसमें कोई शक नहीं कि आज भारत की इस योग पद्धति को विश्व समुदाय में मान्यता मिली हुयी है। यकीनन इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बधाई के पात्र हैं।

आज 21 जून है और इसे अंतर्राराष्ट्रीय योग दिवस के तौर पर मनाया जाता है, किंतु योग किसी एक दिन का या कुछ घंटों का मोहताज नहीं है। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इसको जीवन में उतारा जाये। योग शरीर की हर व्याधि और पीड़ा को हरता है, क्योंकि योग शरीर को व्याधि के अधीन नहीं होने देता। ईशावास्य उपनिषद में एक सूत्र है, तेन त्यक्तेन भुंजीथारू! इसका अर्थ है कि जो त्याग करते हैं वे ही भोग पाते हैं।कुछ लोग योग को हिंदू धर्म का प्रचार मानते हैं। यह ग़लत है। योग एक भारतीय साधना तो है किंतु किसी धर्म- विशेष से इसका कोई संबंध नहीं है। योग सांसों की गति पर नियंत्रण पाना है। यह सही है कि भारतीय ऋ षि और साधक योग करते थे मगर इसका अर्थ यह नहीं कि योग के ज़रिये वे धर्म प्रचार करते थे। यूं भी हिंदू धर्म एक लाइफस्टाइल है। आप इसके दर्शन को आप्त कर सकते हैं किंतु किसी विशेष पूजा- पद्धति अथवा देवता या भगवान को लेकर यह रूढ़ नहीं है। हिंदू धर्म तो यह भी नहीं मानता कि जो उसके ग्रंथ या उसके ऋ षि,मुनि या पंडित- पुरोहित कहें, वही सत्य है। हिंदू धर्म में स्पष्ट कहा गया है कि एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति अर्थात् सत्य एक है, किंतु विद्वान उसे कई तरीक़े से बताते हैं। इससे साफ़ है कि हिंदू धर्म में अपने देवता, भगवान अथवा पुस्तक को ले कर कोई जड़ता नहीं है। इसलिए योग को सिर्फ़ एक जीवन शैली माना जाये किसी धर्म का प्रचार नहीं।

षड दर्शन में योग
आधुनिक भारतीय योग के प्रणेता पतंजलि को माना गया है और भारतीय दर्शन के षड दर्शन में इसको एक अहम् स्थान मिला हुआ है। ख़ास बात यह है कि यह जीव- जगत के पचड़े में नहीं पड़ता और मनुष्य को मोक्ष का रास्ता दिखाता है। यानी कैसे सुख- पूर्वक जिया जाये? इसके लिए ज़रूरी है कि मनुष्य स्वयं को पहचाने। और इसीलिए योग के माध्यम से वह खुद की सत्ता को पहचानने की कोशिश करता है। यम, नियम, प्राणायाम, ध्यान इसके प्रमुख स्रोत हैं। दुनिया के सभी धर्म इन सब बातों को किसी न किसी रूप में मानते हैं। चाहे वह इस्लाम हो या ईसाई धर्म, करुणा, भक्ति और ध्यान। सबके मूल में है ख़ुद ईसा मसीह, करुणामय हैं और हजऱत मुहम्मद साहब भी। योग में किसी देवता की भक्ति का वर्णन नहीं बल्कि उस प्रकृति से एकाकार करना है, जो सबका नियंता है। असली चीज़ है योग के द्वारा व्याधियों से मुक्ति है, भले वे शारीरिक हों या मानसिक।

 

 

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