Tue. Sep 17th, 2019

मुकद्दस रमजान : बेशुमार बरकतों वाला महीना

अल्लाह के नेक बंदे खुद को इस महीने में इबादत करते हुए जन्नत का हकदार बना लेते हैं
आखिरी अशरे में अल्लाह अपने बंदों को जहन्नुम से आजादी देते हैं

लखनऊ
रहमत, मगफिरत के साथ ही जहन्नुम से आजादी दिलाने वाला मुकद्दस रमजान का महीना बेशुमार बरकतों वाला है। इस मुकद्दस महीने के तीन अशरे (हिस्से) होते हैं। इनमें रोजदार पर अल्लाह की रहमत बरसती है। सारे गुनाह माफ हो जाते हैं। जहनुन्न से आजादी मिलती है। अल्लाह के नेक बंदे खुद को इस महीने में इबादत करते हुए जन्नत का हकदार बना लेते हैं।


माह-ए-रमजान का पहला अशरा रहमत का होता है। दूसरा अशरा मगफिरत का होता है। रमजान महीने का अंतिम और तीसरा अशरा जहन्नुम से आजादी का होता है। आखिरी अशरे में अल्लाह अपने बंदों को जहन्नुम से आजादी देते हैं। पहले दस दिन रहमत के अशरे में शामिल हैं। मुसलमानों को रोजा रखने के साथ तिलावत-ए-कलाम पाक और तरावीह की नमाज भी पाबंदी के साथ मुकम्मल करनी चाहिए। पहला अशरा रहमत का है, जिसमें अल्लाह अपने बंदों पर रहमत की बारिश करते हैं।

दस दिन तक अल्लाह की बेशुमार रहमतें बंदों पर नाजिल होती हैं। दूसरा अशरा मगफिरत का है। इस अशरे में अल्लाह मरहूमों की मगफिरत फरमाते हैं। रोजेदारों को उनके गुनाहों से आजाद करते हैं। दूसरे अशरे में अल्लाह से गुनाहों की माफी मांगी जाए तो वह कबूल होती है। तीसरा अशरा जहन्नुम से आजादी का होता है। तीसरे अशरे में अल्लाह अपने बंदों को जहन्नुम से निजात देते हैं। इस मुकद्दस महीने में मुसलमानों को रोजा रखने के साथ पांचों वक्त की नमाज व तरावीह पढ़नी चाहिए।

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