‘पाने’,’बचाने’ की जोड़तोड़ में जातीय बैठकों की ‘होड़’
पंकज चौधरी के अध्यक्ष बनने के बाद ब्राम्हण विधायकों ने दिखाई एकजुटता

योगेश श्रीवास्तव
Brahmin MPs angry: विधानसभा चुनाव से पहले यूपी की सियासत में जातीय राजनीति का गुणाभाग तेजी से लगाया जा रहा है। पीडीए की ‘काट’ के लिए पंकज चौधरी को भाजपा का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद से पार्टी के भीतर ही अगड़ों-पिछड़ों के बीच शक्ति प्रदर्शन की जोर आजमाइश शुरू हो गयी है। भाजपा के सामने दुश्वारी यह है कि वह अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली पीडीए से दोचार होने की तैयारी में जुटे या फिर अपनी ही पार्टी में चल रहे अगड़ी-पिछड़ी जातियों के शक्ति प्रदर्शन का सामना करना पड़े।

पंकज चौधरी के प्रदेशाध्यक्ष बनने के बाद से पार्टी की अगड़ी जातियों ने विधानसभा चुनाव और उससे पूर्व होने वाले संभावित मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर अपनी एकजुटता दिखाने की मुहिम शुरू कर दी है। हालांकि हाल ही में ब्राम्हण विधायकों द्वारा की गयी बैठक को लेकर भाजपा नेतृत्व खासा गंभीर है प्रदेशाध्यक्ष पंकज चौधरी ने इस बावत चेतावनी भी दी है कि इस तरह कि बैठकों से बचना चाहिए। बावजूद इसके पार्टी के ब्राम्हण विधायकों ने अब ब्राम्हण सांसदों की बैठक कर प्रदेश और केन्द्रीय नेतृत्च को अपनी ताकत का एहसास कराने की ठान रखी है।
हालांकि इस तरह की बैठक का यह पहला प्रयोग नहीं है इससे पूर्व मानसून सत्र के दौरान मुरादाबाद के कुंदरकी सीट पर हुए उपचुनाव में निर्वाचित रामवीर सिंह द्वारा आयोजित क्षत्रिय विधायकों की बैठक हो चुकी है। उस बैठक को हालांकि एक पारिवारिक समारोह बताया गया था लेकिन अंदरखाने की खबरों पर यकीन करे तो उस वक्त वह बैठक विधायकों के चहेते अधिकारियों को मनमाफिक पोस्टिग न मिलने या फिर सेवा विस्तार न दिए जाने को लेकर नाराजगी को लेकर थी। क्षत्रिय विधायकों की बैठक के बाद से पिछड़े और दलित विधायकों और संगठन के पदाधिकारियों ने अपने अधिकारियों और उपेक्षा को लेकर बैठके की लेकिन उन पर भाजपा नेतृत्व ने उन्हे इतनी गंभीरता से नहीं लिया। हाल ही में हुई ब्राम्हण विधायकों की बैठक के बाद अब ब्राम्हण सांसदों की बैठक आयोजित किए जाने की खबरे मीडिया में आ रही है।
राजनीतिक जानकारों की माने तो भूपेन्द्र चौधरी के हटने के बाद यह माना जा रहा था कि ठाकुर मुख्यमंत्री होने के बाद प्रदेशाध्यक्ष की कमान किसी ब्राम्हण को दी जा सकती है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ब्राम्हण विधायकों और संगठन के पदाधिकारियों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि उनकी सरकार और संगठन में उपेक्षा हो रही है। विधायकों के साथ-साथ कुछ ऐसी ही बाते दबी जुबान से मंत्रियों के खेमे से आ रही है। कई बैठकों में यह बाते सामने आई कि अधिकारी मंत्रियों की सुनते नहीं या फिर उनके निर्देशों की अनदेखी हो रही है। अपने मंत्रियों विधायकों पार्टी पदाधिकारियों के ताने-उलाहनों से जूझ रही भाजपा को इस समय भीतर बाहर सभी से दो चार होना पड़ रहा है।
2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में दूसरे नंबर पर आने के बाद मिशन-2027 को लेकर भाजपा कोई रिस्क नहीं लेना चाहती इसी गरज से उसका फोकस अखिलेश के पीडीए का माकूल जवाब देने पर है। उसे अगड़ों से ज्यादा पिछड़ो दलितों को पार्टी से जोडऩे के साथ उन्हे वोट बैंक मेे तब्दील करने की रणनीति पर विचार हो रहा है। पंकज चौधरी को प्रदेशाध्यक्ष की कमान सौंपा जाना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। बता दे पिछले लोकसभा चुनाव में एनडीए का नेतृत्व कर रही भाजपा का देश में नारा था अबकी बार चार सौ पार। लेकिन भाजपा के इस नारे की ‘हवा’ यूपी में ही निकल गयी। यूपी में सपा ने भाजपा से ज्यादा सीटे जीतकर उसके सारे दावों की ‘हवा’ निकाल दी।
चारों दलों में कोई अध्यक्ष अपर कास्ट नहीं
यूपी की सियासत में अगड़ों पिछड़ो की लड़ाई में बाजी पिछड़ों के ही हांथ लग रही है। भाजपा में पंकज चौधरी के प्रदेशाध्यक्ष बनने से पहले समाजवादी पार्टी में प्रदेशाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे श्याललाल पाल भी ओबीसी वर्ग से आते है। इसी तरह बसपा के प्रदेशाध्यक्ष विश्वनाथ पाल भी इसी वर्ग से आते है जबकि कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष अजय राय भूमिहार समाज से आते है। भाजपा और कांग्रेस में पहले कई प्रदेशाध्यक्ष अपरकास्ट से रहे लेकिन पिछड़ों के रिझाने के लिए हर बार जाति विशेष के लोगों को प्रदेशाध्यक्ष की कमान सौंपकर उन्हे पार्टी से जोडऩे के साथ उन्हे वोट बैंक में तब्दील करने की कोशिशे हुई।











