
पुनीत मोहन
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मोहसिन रजा उन चुनिंदा मुस्लिम चेहरों में गिने जाते हैं जिन्होंने अपनी बेबाक शैली, स्पष्ट विचारों और मुद्दों पर खुलकर बोलने की आदत के चलते अलग पहचान बनाई है। अब उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष के रूप में उनकी नई जिम्मेदारी ने उनकी राजनीतिक भूमिका को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

मोहसिन रजा की खासियत यह रही है कि उन्होंने अल्पसंख्यक समाज से जुड़े मुद्दों पर बोलते समय भी कई बार परंपरागत राजनीतिक चुप्पी से अलग रास्ता चुना। इसका सबसे बड़ा उदाहरण वक्फ संपत्तियों का मामला है। हाल ही में उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर प्रदेश के शिया और सुन्नी दोनों वक्फ बोर्डों की संपत्तियों की जनपदवार SIT जांच और विशेष ऑडिट की मांग की। रजा ने वक्फ संपत्तियों के रिकॉर्ड में बड़ी संख्या में संपत्तियों के गायब होने और अवैध कब्जों की शिकायतों का मुद्दा मुख्यमंत्री के सामने रखा। उन्होंने संपत्तियों के भौतिक सत्यापन, अभिलेखों के मिलान और फर्जी नामांतरण तथा अवैध कब्जों की जांच की मांग भी की।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वक्फ संपत्तियां मूल रूप से धार्मिक और सामाजिक उद्देश्यों से जुड़ी संपत्तियां हैं। ऐसे में यदि कहीं अनियमितता या अवैध कब्जा है तो उसका नुकसान सीधे उन लोगों को होता है जिनके कल्याण के लिए इन संपत्तियों का उपयोग होना चाहिए। मोहसिन रजा ने इसी सवाल को उठाते हुए पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग की है।
मदरसों के मामले में भी उनका रुख इसी तरह स्पष्ट रहा है। मंत्री रहते हुए उन्होंने मदरसों में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी पाने वालों की जांच की बात कही थी और मदरसा व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए डिजिटल रिकॉर्ड तथा मदरसा पोर्टल जैसे कदमों पर जोर दिया था। उन्होंने ऐसे मदरसों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की जो जांच में सहयोग नहीं कर रहे थे।
2022 में मदरसों की जांच के मुद्दे पर उन्होंने विभागीय जांच के बजाय CBI जांच की मांग भी की थी। उनका तर्क था कि यदि कहीं बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा हुआ है तो उसकी निष्पक्ष और प्रभावी जांच जरूरी है। यही बेबाकी मोहसिन रजा की राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। वह ऐसे मुस्लिम नेता के तौर पर सामने आए हैं जो केवल अपनी पार्टी की राजनीतिक लाइन दोहराने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि मुस्लिम समाज से जुड़े संस्थानों में भ्रष्टाचार, अनियमितता और पारदर्शिता जैसे सवालों को भी सार्वजनिक रूप से उठाते रहे हैं।
उनकी नई जिम्मेदारी का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि अल्पसंख्यक आयोग केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मंच नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े अधिकारों, शिकायतों और सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को संस्थागत स्तर पर उठाने का माध्यम है। अब मोहसिन रजा के सामने चुनौती यह होगी कि अपनी राजनीतिक बेबाकी को आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी के साथ किस तरह जोड़ते हैं।
उनकी नियुक्ति को केवल एक राजनीतिक पद के रूप में देखने के बजाय इसे संवाद, प्रतिनिधित्व और जवाबदेही की नई भूमिका के रूप में भी देखा जा सकता है। खासकर वक्फ संपत्तियों और मदरसा व्यवस्था जैसे संवेदनशील विषयों पर पहले से मुखर रहे मोहसिन रजा के सामने अब अपने अनुभव को संस्थागत कार्रवाई में बदलने का अवसर है।
राजनीति में किसी नेता की पहचान केवल इस बात से नहीं बनती कि वह किस दल में है। कई बार पहचान इस बात से बनती है कि वह अपने ही राजनीतिक और सामाजिक दायरे में असहज सवाल उठाने का साहस कितना रखता है। मोहसिन रजा की राजनीति का एक पहलू यही रहा है। अब जब उन्हें उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग की कमान मिली है, तो उनके सामने सबसे बड़ी कसौटी यही होगी कि बेबाक बयान देने वाले नेता से आगे बढ़कर वह आम नागरिक की शिकायत सुनने वाले और उसका समाधान कराने वाले अध्यक्ष की भूमिका कितनी प्रभावी ढंग से निभाते हैं।
यदि वह वक्फ संपत्तियों की पारदर्शिता, मदरसा शिक्षा की गुणवत्ता, अल्पसंख्यक युवाओं के शिक्षा-रोजगार और सरकारी योजनाओं की पहुंच जैसे विषयों पर प्रभावी हस्तक्षेप कर पाए, तो उनकी नई जिम्मेदारी केवल राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक समाज और शासन के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।












