पितृपक्ष

0
18

वसान्सि जीर्णानि यथाविहाय

नवानि गृहणाति नरोअपराणि

तथा शरीराणि विहाय

जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही

मीरा श्रीवास्तव

लखनऊ। आज हमारी माँ से बिछड़े लगभग एक साल हो गए… दुनिया इधर से उधर हो जाए … सब कुछ सामान्य लगता था, पर माता- पिता भी कभी साथ छोड़ देंगे ये स्वीकार ही नहीं था। पिता जी का साथ और आशीर्वाद है, पर माँ का ही साथ छूट गया…। आज इतने दिन बीत गए ऊपर से सब कुछ सामान्य चल रहा है। पर… मन के अंदर ही नहीं बाहर में भी बहुत बड़ा कोना खाली हो गया है, अपने सुख- दुख को उनसे कह कर फि र उनकी राय सुन कर बड़ी संतुष्टि मिलती थी। उनकी भी बातें सुनना खुशियाँ बांटना, दुख हरना, सेवा करना, बहुत संतोष देता था, अभी भी हर बात के साथ उनकी यादें जुड़ीं हैं और क्यों न हो, जिस धरती माँ पर हम खड़े है उस पर खड़े रहने लायक भी माँ ने ही बनाया है । इसलिए हमारी धरती माँ से भी बढ़ कर हमारी माँ का ऋण हमारे ऊपर है। हमारे सनातन में हम मनुष्य तीन ऋण ले कर पैदा होते है। देव ऋण, ऋषि ऋण, (गुरु ऋण) और पितृ ऋण। जबसे हमने सुना 26 , 27 से 10 तक पितृपक्ष आ रहा है, हमारा मन श्रृद्धा से भर गया, क्योंकि श्राद्ध पक्ष हमारे पूर्वजों से मिलने का समय होता है, उन्हे संतुष्ट करने का प्रसन्न करने का समय होता है। इस पितृपक्ष को अनमोल पक्ष भी माना गया है, क्योंकि इस बार पुर्णिमा में चंद्र ग्रहण और अमावस्या में सूर्य ग्रहण पड़ रहा है। 100 साल के बाद यह पुण्य तिथि पड़ी है।

हमारा धर्म इतना सुंदर है कि जब हमारे अपने हमें छोड़ कर चले जाते हैं तब भी उनके प्रति हमारा प्यार, हमारी भावना कम नहीं होती है । इसी भावना के साथ हम अपने पूर्वजों को श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान करते हैं । इसे आम भाषा मे सोलह श्राद्ध कहा जाता है। ये श्राद्ध तर्पण उनके प्रति कर्तव्य पालन का एक तरीका है। पितृपक्ष, भाद्रपद के पूर्णिमा से अमावस्या तक किया जाता है, इस अमावस को महालय भी कहते हैं । इस दिन तड़के महिशासुर मर्दिनी का पाठ सुनने की सदियों पुरानी परंपरा है। प्रात: दैनिक क्रिया से मुक्त हो कर श्रद्धा पूर्वक इस पाठ को सुनने से सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है , जिसे बहुत ही शुभ माना जाता है। हमारा सनातन धर्म तो पुनर्जन्म मे विश्वास रखता है और आत्मा को अजर- अमर माना जाता है।  इसलिए मृत्यु के बाद जबतक आत्मा को नया शरीर नहीं मिलता, वह पितृलोक मे निवास करती है। पितृपक्ष के दौरान किए गए दान और तर्पण से पूर्वजों की आत्मा को ऊर्जा और तृप्ति मिलती है, जिससे उनकी आगे की यात्रा सुगम होती है और उनकी संतुष्टि से प्राप्त आशीर्वाद हमारे जीवन को सुगम बनाता है।

हिन्दू धर्मग्रंथो जैसे गरुनपुराण और ब्रह्मपुराण के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक के सोलह दिनों के लिए यमराज पितरों को मुक्त कर देते हैं। इस अवधि मे सभी पितर अपने वंशजों से मिलने अन्न- जल-सम्मान ग्रहण करने के लिए वायु रूप मे पृथ्वीलोक पर आते हैं। इन आत्माओं में सभी अच्छी नहीं होती हैं, कुछ हमारी सहायता करके प्रसन्न होते है तो कुछ हमे परेशान करके… जैसे हमारे कार्य में अवरोध डाल कर,बीमारी देकर, आकस्मिक चोट पहेुचा कर, इन दुष्ट आत्माओं से हमारे वंशज ही हमारी रक्षा करते हैं। इसलिए इस समय किया गया तर्पण और श्राद्ध सीधे हमारे पूर्वजों तक पहुंचता है और उन्हें ऊर्जा देता है,जिससे वे एक घेरा बना कर अपने परिवार की रक्षा करते हैं । हमारे पूर्वज जब धरती पर थे तब भी अपने परिवार की रक्षा करते थे और जाने के बाद भी हमारी रक्षा के लिए आते हैं। इसलिए ये समय भय का नहीं बल्कि उनके प्रति श्रद्धा, दान, मान- सम्मान और प्यार का है। इस समय भाद्रपद में श्राद्ध का खगोलीय कारण भी है।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार इस समय सूर्य उत्तर से दक्षिण गोलार्ध की ओर बढ़ता है, दक्षिणायन काल और सूर्य कन्या राशि मे प्रवेश करता है। सूर्य की इस स्थिति के दौरान पृथ्वी और पितृलोक की दूरी इस प्रकार एक सीध मे संरेखित होती है कि हमारे द्वारा दिया गया जल , तर्पण और भोजन, पिंड दान सीधे पीतर देवों तक आसानी से पहुंच जाता है। यदि हम श्राद्ध के इतिहास पर दृष्टि डाले तो यह बताना मुश्किल है कि इसे पहली बार किसने किया , कब किया और कहा किया? क्योंकि यह किसी एक युग काल की देन नहीं है बल्कि हर काल में किसी न किसी रूप मे तर्पण हुआ है। शिव ने पार्वती का तर्पण उनके भस्म को अपने अंगो पर मल कर किया जिससे उनकी आत्मा शिव के प्रेम से सदा के लिए तृप्त हो गई। महाभारत के अनुशासन पर्व में एक कथा के अनुसार युधिष्ठिर ने जब भीष्म पितामह से पूछा कि पहली बार श्राद्ध किसने किया तब भीष्म पितामह ने ऋ षि निमि कि कथा सुनाई।

ऋषि निमि काएक श्रीमद पुत्र था, जिसकी मृत्यु ऋषि से पहले हो गई, इससे ऋषि दुख मे डूब गए,बड़े दुखी मन से चतुर्दशी को उन्होंने अलग -अलग कई प्रकार का भोजन इकट्ठा किया, अमावस्या को सात ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हे भोजन कराया फिर अपने पुत्र के लिए पिंड बनाकर दान किया, किन्तु भावावेश में उन्होंने ये सब कर तो लिया पर बाद मे घबरा गए कि ये सब जो मैंने किया, ये न कही देखा न सुना गया, कहीं मुझसे कुछ गलत तो नहीं हो गया। जब उन्होंने ये बात ऋषि अत्री को बताई जो कि उनसे भी बड़े ऋषि थे, तो उन्होंने बताया कि तुमने कोई गलती नहीं कि है ,क्योंकि ब्रह्मा जी ने श्राद्ध और पिंडदान की परंपरा को बताया है जिसे दूसरे ऋषि मुनि करते आ रहे है।पिंडदान की यह परंपरा ऋग्वेद के दसवें मण्डल मे भी बताई गई है, इसलिए तुमने जो किया है वह अनादिकाल से प्रचलित है, अत: उचित है।

पितृगणाय विद्महे जगत

धारिणी धीमहि तन्नो

पित्रों प्रचोदयात।

राजा भगीरथ ने सगर के साठ हजार पुत्रों का तर्पण गंगा मैया को धरा पर ला कर किया । पौराणिक कथा के अनुसार राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ किया। यज्ञ का घोड़ा गायब हो गया,तो उनके साठ हजार पुत्र उस घोड़े को खोजने निकले , वो घोड़ा उन्हें कपिल मुनि के आश्रम मे बंधा मिला। वे कपिल मुनि को ही दोषी मान कर मुनि को अपशब्द कहने लगे, जबकि उस घोड़े को इन्द्र देव ने छल से कपिल मुनि के आश्रम मे बांधा था। क्योंकि इन्द्र को सगर के अश्वमेध यज्ञ से भय था कि कही सगर का यज्ञ सफल हुआ तो उनका सिंहासन न छिन जाए। सगर स्वर्ग लोक न पहुंच जाये इसलिए उन्होने ये षड्यंत्र रचा था, किन्तु सगर के पुत्र इस षडय़ंत्र से अनभिज्ञ थे। अत: उन्होने मुनि को ही घोड़ा चुराने वाला समझ बैठे और उनके प्रति अनुचित व्यवहार करने लगे। अत्यधिक उत्पात मचाने पर कपिल मुनि का ध्यान भंग होने से उनकी आंखे खुली उनके तेज के प्रभाव से सगर के साठ हजार पुत्र जल कर भष्म हो गए । उन पुत्रों की आत्मा इस आकस्मिक मृत्यु से अतृप्त हो कर भटकती रही।

राजा सगर के वंशज भगीरथ को जब अपने वंश के इस अप्रत्याशित दुखद घटना का भान हुआ और ज्ञात हुआ कि गंगा के जल को स्पर्श करने मात्र से ही इनकी आत्मा को शांति मिलेगी, ये तृप्त होंगे तो भागीरथ अपने पूर्वजों को तारने के लिए गंगा को धरती पर लाने का प्रण करते हैं। शिव का घनघोर तप करते हैं ,उनके तप से प्रसन्न हो कर शिव जी ने गंगा को धरा पर आवाहन किया। उनके तीव्र वेग से धरा को बचाने के लिए उन्हे अपने जटा में सम्हाला। पुन: भगीरथ के साथ धरती पर भेजा, धरा पर आते ही गंगा की पवित्रता से भस्मभूत हुये भगीरथ के वंशज तृप्त हुये और स्वर्ग को प्राप्त किए। भगीरथ के द्वारा गंगा को धरा पर लाने के कारण गंगा भागीरथी के नाम से जानी जाती हैं। अगर हम त्रेता और द्वापर की बात करे तो इस युग में भी अपने पूर्वजों के तर्पण की कथा मिलती है। जब श्री राम चौदह वर्ष का वनवास काट रहे थे, उसी बीच पिता के निधन की खबर मिलने पर एक पुत्र होने के नाते अपने कर्तव्य का पालन करते हैं और बिहार के गया मे फल्गु नदी के तट पर राजा दशरथ का पिंडदान और श्राद्ध करते हैं।

बौद्ध गया मे फल्गु नदी को पितरों के श्राद्ध और पिंड दान के लिए विशेष पवित्र माना जाता है। वैसे वाल्मीकि रामायण के अनुसार, वनवास के समय श्री राम ने राजा दशरथ के लिए चित्रकूट में मन्दाकिनी नदी के तट पर जल और पिंड अर्पित किया था, इसलिए चित्रकूट का मन्दाकिनी का घाट भी श्राद्ध के लिए विशेष महत्व रखता है। अलग- अलग ग्रंथो में अलग -अलग स्थान पर तर्पण और श्राद्ध के महत्व का पता चलता है। महाभारत काल मे जब कर्ण को स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो उन्हें भोजन मे स्वर्ण आभूषण ही मिलता है क्योंकि धरती पर उन्होंने रुपया, पैसा, स्वर्ण आदि ही दान किया था, अन्न और जल का दान नहीं किया था। कर्ण ने बताया कि उन्हें अपने पूर्वजों के बारे में ज्ञात नहीं था, न ही श्राद्ध के बारे में। तब कर्ण के बहुत प्रार्थना करने पर यमराज ने उन्हें पुन: धरा पर 16 दिनों के लिए भेजा। धरती पर आकर कर्ण ने सोने, चाँदी, रत्नों के अतिरिक्त अन्न- जल आदि से अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं और खूब दान करते हैं। जिससे पुन: स्वर्ग में उन्हें वो सब कुछ मिला जो उन्होंने दान किया था। तब से ही ये श्राद्ध काल सोलह दिन का माना जाने लगा। इस कथा से हमे क्या सीखने को मिलता है कि हम धरती पर जो कुछ भी करेंगे उसका प्रतिफल हमे ईश्वर उसी रूप मे देता ह, इसलिए अपने जीवन की कुशलता को ध्यान मे रखते हुये धर्म पथ पर चलना चाहिए।

वेद,पुराण, पवित्र ग्रंथ इनकी कथा ही हम सनातनी के श्रेष्ठ जीवन का आधार है। इसके अनुसार पितृपक्ष मे श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए पवित्र नदियों के तट को सर्वोत्तम माना गया है। शास्त्रों के अनुसार पवित्र नदियों मे स्नान कर उनके तट पर पितृ कर्म करने से पूर्वजों की आत्मा को मोक्ष मिलता है। पितृपक्ष मे बिहार के गया जी को प्रधान तीर्थ माना जाता है यहा पर फल्गु नदी के तट पर किए गए श्राद्ध से पितरों को अक्षय तृप्ति मिलती है। वाराणसी, प्रयाग, हरिद्वार में गंगा, संगम के तट पर किया गया श्राद्ध पितर को मोक्ष देता है। हमारे मन मे अपनों के प्रति , दूसरों के प्रति, पशु- पक्षियों के प्रति प्रकृति के प्रति प्रेम समर्पण, श्रद्धा, सेवा, दान, सहायता के भाव हो, यही हमारा कर्तव्य है। सनातन धर्म है और ये हि भाव जीवन के पश्चात अपनों के लिए श्राद्ध है।

हे पितृदेव ! अस्मान अनुगृहन्तु । अस्माकम दोषान क्षमन्तु अस्मान सुखी कुर्वंतु ।।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here