
डॉ. प्रियंका सचदेवा
नई दिल्ली। श्रेणी- समाज और प्रौद्योगिकी, टेक एंड सोसाइटी- आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, वहां सूचना हमारी उंगलियों पर है। किसी घटना की ताज़ा खबर हो, कोई वायरल वीडियो या कोई चौंकाने वाला दावा -सोशल मीडिया के माध्यम से सब कुछ, कुछ ही क्षणों में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। लेकिन क्या सूचना का तेजी से प्रसारित होना उसकी सत्यता की गारंटी है ? और क्या डिजिटल दुनिया में दिखाई देने वाली सामग्री के पीछे केवल तकनीक काम करती है, या इसके निर्माण और प्रसार में मानवीय श्रम की भी कोई भूमिका है ? ये प्रश्न हमें डिजिटल समाज की दो महत्वपूर्ण चुनौतियों की ओर ले जाते हैं। फेक न्यूज़, भ्रामक समाचार और डिजिटल श्रम, डिजिटल लेबर।

जब झूठ खबर बन जाता है फेक न्यूज़
आज केवल पत्रकारिता की समस्या नहीं रह गई है। यह सामाजिक विश्वास, जनमत और लोकतांत्रिक संवाद को प्रभावित करने वाली एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म पर सूचना का प्रसार जितना आसान हुआ है, उसकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करना उतना ही आवश्यक हो गया है। कई बार कोई भ्रामक संदेश या पुराना वीडियो बिना सही संदर्भ के साझा किया जाता है और देखते ही देखते व्यापक चर्चा का विषय बन जाता है। हालांकि, प्रत्येक गलत सूचना को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं है। सूचना अव्यवस्था, इन्फार्मेशन डिसऑर्डर को सही ढंग से समझने के लिए इसके तीन प्रमुख रूपों के बीच अंतर करना आवश्यक है।
1-मिसइन्फार्मेशन – ऐसी गलत सूचना, जिसे कोई व्यक्ति बिना किसी को धोखा देने के इरादे से साझा करता है। उदाहरण के लिए, किसी पुरानी घटना की खबर या स्कूल बंद होने का भ्रामक संदेश बिना जांचे आगे भेज देना।
2- डिसइन्फार्मेशन – जब गलत सूचना जान बूझकर किसी दुर्भावना या एजेंडे के तहत तैयार और प्रसारित की जाती है। किसी राजनीतिक उम्मीदवार के बारे में झूठा दावा फैलाना, भ्रामक एडिटिंग या कृत्रिम बुद्धिमत्त, एआई की सहायता से डीपफेक तैयार करना इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
3- मालइन्फार्मेशन- इसमें वास्तविक और सच्ची जानकारी का उपयोग किसी व्यक्ति, संस्था या समूह की छवि धूमिल करने और नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है। जैसे- निजी तस्वीरों या गोपनीय डेटा का अनैतिक उपयोग। डिजिटल युग में कोई संदेश केवल इसलिए विश्वसनीय नहीं हो जाता कि उसे किसी परिचित ने भेजा है या उसे हज़ारों लाइक और शेयर मिले हैं। सनसनीखेज शीर्षक, आकर्षक थंबनेल और एआई- जनित भड़काऊ सामग्री इस प्रसार में ईंधन का काम करते हैं।
डिजिटल श्रम- सुविधा के पीछे किसका योगदान ?
डिजिटल दुनिया का एक दूसरा पहलू भी है, जो अक्सर हमारी नजऱ से ओझल रहता है। हम प्रतिदिन सोशल मीडिया पर रील देखते हैं, ऑनलाइन खरीदारी करते हैं और डिजिटल सेवाओं का लाभ उठाते हैं। लेकिन इस तकनीकी सुविधा के पीछे मौजूद मानवीय श्रम, समय और रचनात्मकता पर ध्यान अपेक्षाकृत कम जाता है। डिजिटल श्रम, डिजिटल लेबर- उन सभी गतिविधियों को संदर्भित करता है जो डिजिटल तकनीकों और प्लेटफॉम्र्स के माध्यम से की जाती हैं और डिजिटल अर्थ व्यवस्था के लिए मूल्य उत्पन्न करती हैं।
1- दृश्यमान श्रम, विजिबल लेबर- इसमें कंटेंट क्रिएटर्स, सोशल मीडिया मैनेजर, डेटा लेबलिंग करने वाले इंजीनियर, गिग वर्कर्स और कंटेंट मॉडरेटर्स शामिल हैं, जिनका काम डिजिटल प्लेटफार्म के संचालन का आधार है।
2- अदृश्य अवैतनिक श्रम ,अनपेड लेबर- जब एक सामान्य उपयोगकर्ता फोटो अपलोड करता है, कमेंट लिखता है, या रील्स शेयर करता है, तो वह अनजाने में विशाल डेटा उत्पन्न कर रहा होता है। प्लेटफार्म इसी डेटा का उपयोग अपने एल्गोरिदम को बेहतर बनाने और विज्ञापनों से मुनाफा कमाने के लिए करते हैं। जहा कंटेंट क्रिएटर्स पर लगातार नई सामग्री बनाने का मानसिक तनाव रहता है, वहीं गिग वर्कर्स की आय प्लेटफार्म के एल्गोरिदम पर निर्भर करती है। सबसे कठिन स्थिति कंटेंट मॉडरेटर्स की होती है, जिन्हें हर दिन घंटों हिंसक या आपत्तिजनक सामग्री की समीक्षा करनी पड़ती है। जिम्मेदार डिजिटल नागरिकता की आवश्यकता फेक न्यूज़ और डिजिटल श्रम ये दोनों मुद्दे हमें डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म के सामाजिक प्रभावों पर गहराई से विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं। व्यावसायिक लाभ और यूज़ की दौड़ कभी-कभी सनसनीखेज और भ्रामक सामग्री को बढ़ावा देती है। इससे निपटने के लिए मीडिया साक्षरता, मीडिया लिटरेसी सबसे बड़ा हथियार है। मीडिया साक्षरता का अर्थ केवल स्मार्ट फोन या इंटरनेट का उपयोग करना नहीं, बल्कि प्राप्त जानकारी का सही मूल्यांकन करना है।
एक जागरूक डिजिटल नागरिक के रूप में ध्यान रखें
1- मूल स्रोत की पुष्टि करें- किसी भी सनसनीखेज खबर को शेयर करने से पहले प्रामाणिक समाचार वेबसाइटों या आधिकारिक स्रोतों से मिलान करें।
2- रिवर्स इमेज सर्च का प्रयोग करें- संदिग्ध तस्वीरों और वीडियो की वास्तविकता जानने के लिए डिजिटल टूल्स का सहारा लें।
3- संयम बरतें- हर वायरल खबर सच नहीं होती। लोकप्रियता को सत्यता का प्रमाण न मानें।
4- श्रम का सम्मान करें- समझें कि ऑनलाइन उपलब्ध हर सुविधा के पीछे किसी न किसी इंसान का श्रम और समय शामिल है। निष्कर्ष डिजिटल क्रांति ने ज्ञान और अभिव्यक्ति के असीमित द्वार खोले हैं। लेकिन इस डिजिटल युग की वास्तविक समझ तभी विकसित होगी जब हम सूचना की सत्यता की रक्षा करेंगे और इस व्यवस्था को चलाने वाले मानवीय श्रम के अधिकारों और गरिमा को पहचानेंगे। डिजिटल दुनिया में जागरूकता का अर्थ केवल यह जानना नहीं है कि हम स्क्रीन पर क्या देख रहे हैं, बल्कि यह समझना भी है कि हम किस सूचना पर विश्वास कर रहे हैं और क्यों।












