जंतर-मंतर से बुराड़ी तक: संवैधानिक संतुलन और नागरिक गरिमा का एक सुविचारित निर्णय

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लोक-नीति एवं संवैधानिक अधिकार

साहिल बब्बर

नई दिल्ली। राजधानी में प्रदर्शन- स्थल बदलने का हर निर्णय आरंभ में आशंकाओं से घिरता है, किंतु लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं परिपक्वता प्राय: ऐसे ही प्रशासनिक पुनर्गठनों से अर्जित करती हैं। दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार के 11 अक्टूबर 2026 के स्थायी आदेश ने जंतर- मंतर को निर्धारित प्रदर्शन- स्थलों की सूची से हटाकर रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी ग्राउंड को नए स्थल घोषित किया है। (प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया, ‘जंतर-मंतर’)। यह कदम गृह मंत्रालय की समिति की सिफ़ सिफारिशों पर आधारित है (‘दिल्ली शिफ्ट्स’)। इस लेख का तर्क है कि बुराड़ी जैसे विशाल मैदान की ओर यह स्थानांतरण न्यायिक अपेक्षाओं, संवैधानिक संतुलन, जन- सुरक्षा और प्रदर्शनकारियों की गरिमा, चारों कसौटियों पर दूरदर्शी निर्णय है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की उस शासन- शैली को दर्शाता है जो तदर्थ उपायों के बजाय समिति- आधारित, प्रक्रियागत समाधान को प्राथमिकता देती है।

पहली बात, यह निर्णय विच्छेद नहीं, सतत प्रशासनिक परंपरा का परिणाम है। अक्टूबर 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बोट क्लब पर किसानों के विराट जमावड़े के बाद सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था की चिंताओं से पाबंदियां लगीं, और 1993 तक जंतर- मंतर विकल्प बनकर उभरा, (प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया, ‘जंतर -मंतर’)। बोट क्लब से जंतर- मंतर और अब बुराड़ी तक की यात्रा बदलते नगर- जीवन के अनुरूप स्थल- व्यवस्था के विकास की कथा है। वर्ष 2011 में, तत्कालीन यूपीए शासनकाल में, अन्ना हज़ारे के अनिश्चितकालीन अनशन के समय पुलिस ने स्वयं बुराड़ी का सुझाव दिया था (डीएचएनएस)। अत: यह विचार किसी एक दल की उपज नहीं, प्रशासनिक विवेक की निरंतरता है।

दूसरी बात, संवैधानिक और न्यायिक दृष्टि से निर्णय संगत है। अनुच्छेद 19 (1) (ख) शांतिपूर्ण सम्मेलन का अधिकार देता है, तो अनुच्छेद 19 (3) लोक-व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बधन की अनुमति भी। जुलाई 2018 के मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्ण प्रतिबंध को समाधान नहीं माना, किंतु संख्या- सीमा, निर्धारित स्थल और लंबे पड़ाव पर रोक जैसे नियमन सुझाए (प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया,’जंतर मंतर’)। वर्ष 2020 में अमित साहनी मामले में तीन.सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट किया कि असहमति के प्रदर्शन निर्धारित स्थलों पर ही हों (अमित साहनी)। और 9 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने जंतर-मंतर का उपयुक्त विकल्प विचारने को कहा तथा शौचालय, पेयजल और चिकित्सा-सहायता जैसी सुविधाओं पर ज़ोर दिया (ओपन ब्यूरो)। सरकार ने इसी संकेत को क्रियान्वित किया है। यह देशव्यापी प्रतिबंध भी नहीं, आयोजकों को केवल अनुमति और संशोधित पुलिस प्रक्रिया का पालन करना होगा (ओपन ब्यूरो)।

तीसरी बात, क्षमता और गरिमा का प्रश्न है। जंतर-मंतर पर अधिकतम 5,000 लोगों की सीमा थी, जबकि बड़े प्रदर्शन रामलीला मैदान के लिए तय थे (प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया,’जंतर मंतर’)। इसके विपरीत डीडीए के स्वामित्व वाला बुराड़ी मैदान लगभग 23 हेक्टेयर में फैला है, तीन से चार लाख लोगों को समायोजित कर सकता है और धार्मिक आयोजनों व रैलियों का पुराना साक्षी है (थापा)। ऐसे मैदान में अस्थायी शौचालय, पेयजल, चिकित्सा- शिविर और भीड़- प्रबंधन की व्यवस्था व्यावहारिक रूप से संभव है, पुलिस की प्रस्तावित विस्तृत एसओपी इसी दिशा को ठोस रूप देगी (‘दिल्ली पुलिस डी- नोटिफ ाइज़’) चौथी बात, राजधानी के निवासियों और संस्थानों के अधिकार हैं। पीटीआई के अनुसार निवासियों ने शोर, कचरे, अस्थायी ढांचों और प्रदर्शनकारियों के लंबे पड़ाव की शिकायतें कीं। अक्टूबर 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने जंतर- मंतर पर प्रदर्शन-प्रतिबंध का आदेश तक दिया, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर संतुलित नियमन का मार्ग चुना (‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया,जंतर मंतर’ )।

प्रश्न यह भी है कि आपातकालीन पहुंच, यातायात और अन्य निवासियों के हितों से समझौता किए बिना लोग सुरक्षित ढंग से प्रदर्शन कर सकें (ओपन ब्यूरो)। तीन सौ वर्ष से अधिक पुरानी वेधशाला के परिवेश की गरिमा भी इसी संतुलन का हिस्सा है। आलोचक कहते हैं कि बुराड़ी जंतर-मंतर से लगभग 20-21 किलोमीटर दूर है और प्रदर्शन सत्ता- केंद्र से और दूर चले गए हैं (थापा)। सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका भी दाखिल हुई है, जो नए स्थलों की उपयुक्तता पर प्रश्न उठाती है (प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया, ‘प्ली’ )। किंतु डिजिटल युग में किसी मांग की शक्ति भौगोलिक निकटता से नहीं, उसकी वैधता और संचार-माध्यमों की पहुंच से तय होती है। न्यायिक समीक्षा का खुला द्वार दर्शाता है कि सरकार ने कोई अलंघ्य दीवार नहीं, विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाई है, और एसओपी में सुविधाओं, अनुमति- समय सीमा तथा सुरक्षा के प्रावधान गढऩे का अवसर सरकार और नागरिक समाज, दोनों के पास है।

निष्कर्ष : जंतर-मंतर से बुराड़ी की ओर यह कदम प्रदर्शन के अधिकार का अवमूल्यन नहीं, उसका संस्थागत परिष्कार है। इसमें न्यायालय की अपेक्षाओं का पालन है, निवासियों की शांति का सम्मान है, राजधानी की सुरक्षा का विवेक है और लाखों नागरिकों के गरिमापूर्ण ढंग से एकत्र होने की संभावना है। यदि संशोधित एसओपी सुविधाओं, पारदर्शिता और समयबद्ध अनुमति पर खरी उतरी, तो यह निर्णय सुशासन के उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा। जागरूक युवा पीढ़ी को चाहिए कि वह शोर नहीं, साक्ष्य के आधार पर इस पहल को समझे और समर्थन करे।

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