
रघु ठाकुर
नई दिल्ली। इस समय दुनिया में, विशेष कर अमेरिका, यूरोप, चीन और रूस को छोड़कर जेन जी की चर्चा ज्यादा है। खाड़ी देश और विशेषकर एशिया के कई देशों में जेन जी के आंदोलन के नाम से सरकारें बदलीं है। जब मिस्र में जैस्मीन रिवॉल्यून के नाम से आंदोलन शुरू हुआ और सैन्य हस्तक्षेप के बाद सत्ता परिवर्तन के साथ समाप्त हुआ था। बदलाव के नाम पर केवल इतना ही हुआ कि रूस समर्थक सत्ताधीश हटकर अमेरिका समर्थक सरकार आ गई। बांग्लादेशया नेपाल और श्रीलंका में भी जो आंदोलन हुए उससे भी सरकारें तो बदली है पर कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ, सिवाय इसके कि चीन समर्थक या चीन से मित्रता रखने वाली सरकार बदली परंतु व्यवस्था जस की तस है। नेपाल में माक्र्सवादी सरकार को हटाकर जेन जी की पीढ़ी से श्री बालेन शाह सत्ता में आए और आने के बाद उन्होंने सबसे पहले कॉलेज और विश्वविद्यालय में जहां से जेन जी का उदय हुआ और आंदोलन शुरू हुआ था उनके ऊपर ही बेन लगा दिया। छात्र संघों के चुनाव खत्म कर दिए। यानी कोई नया नेतृत्व पैदा ना हो सके और अब स्थिति यह है कि अब बालेन शाह के खिलाफ जेन जी के नौजवान आंदोलन कर रहे हैं, यहां तक की तीन नौजवान आत्मदाह कर चुके हैं।

बांग्लादेश में भी युवकों का आंदोलन शुरू हुआ था जो मुक्ति वाहिनी के परिवारजनों को शेख हसीना सरकार के द्वारा आरक्षण वृद्धि के खिलाफ था। बाद में हिंसक और आंदोलन से प्रधानमंत्री हसीना को बचाने के लिए सेना अध्यक्ष ने उन्हें देश छोडऩे की सलाह दी और आज वहां वीएनपी की सरकार है। श्रीलंका में भी इसी तर्ज पर आंदोलन के बाद सरकार बदली और अब नई पीढ़ी का प्रतिनिधि राष्ट्रपति है। परंतु सिवाय वैश्विक रिश्तों से बदलाव के अलावा कुछ ज्यादा नहीं बदला। पिछले मई माह में भारत में नीट परीक्षाओं के पेपर लीक हुए थे। यद्यपि सरकार ने 21 जून को पुनरू परीक्षा कराई। जिसमें कोई पेपर लीक नहीं हुआ। परंतु निराशा में लगभग 21 छात्रों ने आत्महत्या कर ली। यद्यपि मैं आत्महत्या को कतई उचित नहीं मानता। आत्महत्या निराशा के साथ-ंसाथ मानवीय कमजोरी भी है परंतु जिन बच्चों ने इस निराशा में आत्महत्या की उनके मन की पीड़ा उनके परिवारजनों की पीड़ा की कल्पना भी कठिन है। एक बच्ची कुमारी प्रियंका का आत्महत्या के पूर्व लिखा पत्र बहुत ही मार्मिक है। उसने अपने पिता को लिखा कि मैं एक वर्ष से नीट परीक्षा की तैयारी कर रही थी पेपर लीक होने की वजह से परीक्षा की नई तिथि आई पर अब मैं दोबारा परीक्षा में बैठने का साहस नहीं कर सकती। साल भर नौजवान छात्र घरों से बाहर रहते हैं और तैयारी में लाखों रुपये खर्च होते हैं। वे दिन रात पढ़ते हैं? पर जब पेपर लीक होकर परीक्षाएं बढ़ती है तो उन्हें अपना सारा भविष्य अंधकार में लगता है। मोदी ने या उनकी सरकार ने बच्चों और परिवारजनों के लिए दो शब्द भी सांत्वना के नहीं कहे। यहंा तक कि हम लोगों के द्वारा उनसे सार्वजनिक मांग करने के बाद भी अपने मन की बात में इन बच्चों को सांत्वना नहीं दी उल्टे गणेश चतुर्थी व स्थापना के अवसर पर मिट्टी के गणेश जी ना बनाने की अपील की, जबकि गणेश स्थापना के लिए अभी तीन माह का समय था। यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अतिक्रूता और घमंड था कि देश में नेरेटिव की चर्चा वही तय करते हैं। यद्यपि 21 जून को परीक्षाएं निर्विघ्न हो गई। एक सप्ताह बाद परिणाम भी आ गये लगभग 12 लाख बच्चे नीट में पास हो गए और लगभग साढ़े ग्यारह हजार बच्चों का चयन चिकित्सा शिक्षा में भी हो गया, परंतु जो घाव 23 लाख नीट के परीक्षार्थियों और उनके परिवारजनों के मन में लग चुका था उसकी जड़ समाप्त नहीं हो सकी। भले ही 23 लाख से घटकर पुन: हुई परीक्षा में 22 लाख बच्चे बैठे, परंतु उनके मन में यह टीस थी कि अगर पहले परीक्षा ठीक हो जाती तो शायद वह भी पास हो जाते।
इस घटनाक्रम के लगभग दो माह बाद अमेरिका में रह रहे और काम कर रहे कुछ नौजवानों के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री सूर्यकांत शर्मा की एक गैर जरूरी टिप्पणी जिसमें उन्होंने इन नौजवानों की तुलना कॅाकरोच से की थी, के विरोध में कॉकरोच जनता पार्टी बनी और सोशल मीडिया के नए माध्यमों व्हाटसएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एआई और चैट जीपीटी तथा इस प्रकार के नए टूल्स के माध्यम से इस नई पीढ़ी जिसे जेन जी कहा जाता है कि यानी जो बच्चे 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए और जो सोशल मीडिया के नए माध्यमों के अभ्यस्त हैं ,पर सीजेपी का समाचार पहुंचा। कुछ समय बाद यह भी खबर आई की सीजेपी के फ ॉलोअर्स 2 करोड़ हो चुके हैं। और यह भी कि पिछल्ेा 20 वर्षों में ही भाजपा के फ ॉलोअर्स इससे कम हैं। इन खबरों से भी नई पीढ़ी के मन में और उत्साह जगा हालांकि 2 करोड़ फ ॉलोअर्स वाले सीजेपी के मुखिया अभिजीत दिपके जब (अचानक या भेजे गये) हिन्दुस्तान आये तो उनकी पहली सभा जो जंतर मंतर में हुई थी उसमें बमुश्किल से 300 से 400 से भी कम की संख्या में लोग थे। 6 जुलाई से उन्होंने पुन: जंतर मंतर पर धरना शुरू किया जिसके बाद में स्विटजरलैंड से आकर सोनम वांगचुक शामिल हुए और उन्होंने अनशन शुरू कर दिया। 11 जुलाई को मेरे एक मित्र अमरदीप चौरसिया वहां गए थे, वे उस आंदोलन में भक्ति भाव से समर्पित थे, ने 12 जुलाई को मुझे ये बताया कि 11 जुलाई को जंतर मंतर पर लगभग 200 से 250 लोग थे और 12 जुलाई को क्योंकि इतवार है इसलिये उनकी संख्या बढ़ कर 400 से 500 हो सकती है। यानी देश के छात्रों और नौजवानों की तकनीकी भागीदारी अवश्य थी परंतु सक्रिय भागीदारी नहीं थी। आरंभ में सीजेपी के तत्कालीन मार्गदर्शक व प्रवक्ता योगेन्द्र यादव ने मंच से कहा था कि राजनीतिक दलों के लोग ना आए और यदि आएं तो झंड़ा, डंडा छोड़कर आयें। और कुछ ही दिनों के बाद सीजेपी ने संसदीय राजनीतिक दलों का कालीन बिछाकर स्वागत किया और यहां तक कि श्री वांगचुक और अन्य लोगों ने भी यह अपील की कि यदि राजनीतिक दल संसद में इसे उठाने को तैयार हों तो वह अपना अनशन तोड़ देंगे। पंरतु किसी राजनीतिक दल ने औपचारिक रुप से अनशन तोडऩे की अपील नहीं की।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने एक सार्वजनिक बयान देकर कहा कि हम इसे संसद में उठायेंगे परंतु वांगचुक से कोई अपील नहीं की। 19 जुलाई को उन्हें ले जाकर अस्पताल में भर्ती करने के बाद और 20 जुलाई को संसद मार्ग पर लाठी चार्ज और हिंसा के बाद, सभी संसदीय विरोधी दलों ने आँसू बहाना शुरू कर दिया। यानी पहले तुम पिटो फि र हम आँसू बहाएंगे और अपना वोट बैंक सजायेंगे। सभी सूचनाओं के अनुसार 20 जुलाई के मार्च में भी लगभग 8 से 10 हजार लोग थे जिसमें वामपंथी संगठन यानी एआईएसए, एएसएफआई तथा भीम आर्मी के नौजवान, अन्य राजनीतिक दलों के, आम आदमी पार्टी के कुछ नौजवान, जेएनयू के छात्र तथा सोशल मीडिया पर बने एक आक्रामक माहौल से प्रभावित छात्र नौजवान भी वहां पहुंचे थे। 2010 में अन्ना हजारे के अभियान के समय कारपोरेट ने इलेक्ट्रिानिक मीडिया को लगभग खरीद लिया था। जिस पर महीनों केवल अन्ना हजारे ही आते थे। इस बार सोशल मीडिया और उसके टूल्स को भी लगभग इसी प्रकार इस्तेमाल किया गया। इन टूल्स के मालिक विदेश कारपोरेट हैं। इसकी शुरूआत करने वाले भी विदेश में निवास करते हैं और प्रचार -प्रसार शक्ति के माध्यम से कुछ समय में देश में प्रसारित और चर्चित हो जाते हैं। अन्ना अभियान को व इस अभियान के इस पक्ष को भी देश को समझना होगा। मई माह में हमारी लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी ने दिल्ली, ग्वालियर और चांपा तथा अन्य स्थानों पर धरना प्रदर्शन किया और ज्ञापन दिया, बयान दिये, पत्रकार वार्ता की, लेख लिखे, सभाएं आदि की परंतु हम देश के नौजवानों का साथ नहीं पा सके और सरकार भी नहीं पिघली। क्योंकि इसका मतलब है कि कोई व्यक्ति अपनी शक्ति भर लडऩे-ंलडऩे पर जीवन लगा सकते हैं, परंतु देश में चर्चा विदेशी प्रायोजित प्रचार तंत्र की ताकत वालों की ही होगी।
यह जेन जी का वर्गीकरण कहां से हुआ और क्यों हुआ यह भीविचारणीय है। दुनिया के माक्र्सवादियों ने अमीर गरीब का वर्गीकरण किया था। डॉक्टर लोहिया के समाजवादी विचारों के बाद अमीर गरीब के अलावा सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के आधार पर वर्गीकरण हुआ। बाबा साहब अम्बेडकर के विचारों के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का वर्गीकरण हुआ। परंतु यह सब वर्गीकरण कहीं ना कहीं विषमता को समाप्त कर समता की व्यवस्था को चाहने वाले थे। अब यह नया आयु आधारित वर्गीकरण दुनिया के मूल प्रश्न गरीबी, विषमता, पूंजीवाद, सामंतवाद, जातिवाद जैसी शाश्वत बीमारियों की चर्चा को ना कर केवल उस उम्र पर आधारित वर्गीकृत समाज बनाना चाहता है। यह वर्गीकरण पूंजीवाद का रणनीतिक खेल है किस प्रकार 20वीं शताब्दी में सभ्यताओं के संघर्ष के नाम पर धार्मिक धु्रवीकरण और धार्मिक धु्रवीकरण फैलाकर पंूजीवाद को समता के विचार के आक्रमण से बचाने का खेल शुरू हुआ था और जो अब कमजोर पड़ गया है, इसलिये पूंजीवाद ने अब इस नए आयु वर्गीकरण की ओट में अपनी सुरक्षा की योजना पुन: तैयार कर ली है।
यह जेन जी की पीढ़ी संख्यात्मक दृष्टि से देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी के बराबर है। यह नितांत आत्म केंद्रित औ नई तकनीक के औजारों की अभ्यस्त है। इसकी दुनिया इंस्टाग्राम, एक्स ,मीम तय करती है। यद्यपि सरकार ने अब लाचार होकर शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा स्वीकार कर लिया है,पर देश की इस जेन जी पीढ़ी और आम दिलों में घाव लग चुका है और वह प्रधानमंत्री जी की नकली उदारता या हथकंडों से प्रभावित होने वाला नहीं है। बहुत संभव है कि यह निरेटिव देश या में लंबा चले और आगामी चुनाव में इन सरकारों को बदलकर नई पीढ़ी व नए नेतृत्व को अवसर मिले। हालांकि विचारधारा के बारे में केवल एक शाब्दिक प्रतिक्रिया पर बनी पार्टी कितनी दूर जाएगी यह कहना अभी कठिन है। क्योंकि दो देशकों में देश के राजनीतिक मुद्दे और सरकारें कॉर्पोरेट ही बना रहे हैं।












