मनुस्मृति में संशोधन नहीं, शास्त्रों में प्रक्षेप और चोरी हुई पांडुलिपियों को सामने लाना हमारा उद्देश्य : स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती

0
6
संस्कृति संसद में स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने श्रीकाशी विद्वत परिषद की अध्यक्षता में समिति गठित करने का रखा प्रस्ताव
दो वर्षों में विदेशों में उपलब्ध भारतीय पांडुलिपियों को वापस लाने का आह्वान
विशेष संवाददाता
वाराणसी। संस्कृति संसद में मनुस्मृति और भारतीय धर्मशास्त्रों से जुड़े विमर्श को संबोधित करते हुए स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने कहा कि हमारा उद्देश्य शास्त्रों में संशोधन करना नहीं है। शास्त्रों में संशोधन करना न हमारी औकात है और न ही हमारा अधिकार। हमारा विषय यह है कि भारतीय धर्मशास्त्रों में कहां और किस प्रकार प्रक्षेप किए गए, किन मूल ग्रंथों में मिलावट हुई और भारत की बहुमूल्य पांडुलिपियां किस प्रकार विदेशों में पहुंचीं। इन सबका पर्दाफाश करना और अपनी बौद्धिक संपदा को वापस लाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि भारत में वर्ष 1556 में गोवा के पणजी में बाइबिल के मुद्रण के लिए छापाखाने की मशीन आई। इससे पहले भारत में ऋषि, मुनि और विद्वान ताड़पत्रों पर लेखन करते थे। उन्होंने कहा कि भारतीय धर्मशास्त्रों और परंपराओं को लेकर अनेक प्रकार के प्रश्न खड़े किए गए। गोस्वामी तुलसीदास जी के जन्मस्थान और सूरदास जी के जन्मकाल को लेकर भी विवाद खड़े किए गए। वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों ने सनातन परंपरा के विभिन्न पक्षों को एक विशेष दृष्टि से देखने का प्रयास किया। इसी क्रम में कुछ ऐसे सूत्र और साक्ष्य सामने आए हैं, जिन पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
स्वामी जी ने वर्ष 1793 से पहले की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में शासन स्थापित करने के बाद अंग्रेज न्यायाधीशों के सामने यह समस्या थी कि यहां के लोगों के मामलों में निर्णय किस आधार पर किया जाए। इसी उद्देश्य से हिंदू लॉ बनाने के नाम पर भारतीय धर्मशास्त्रों और पांडुलिपियों का संग्रह किया गया। उन्होंने विलियम जोन्स का उल्लेख करते हुए कहा कि बंगाल के ब्राह्मणों के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में लगाए गए एक चित्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उसमें भारतीय ब्राह्मण को जूते के नीचे बैठा हुआ दिखाया गया है। ऐसे ऐतिहासिक चित्रों और घटनाओं को भी समाज के सामने लाने की आवश्यकता है।
उन्होंने आगे कहा कि भारत से अनेक पांडुलिपियों का संग्रह करके उन्हें ब्रिटेन भेजा गया। ये पांडुलिपियां लोहे के बक्सों में भरकर यहां से ले जाई गईं। उन्होंने रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन और लॉर्ड टिग्नामेंट बाउंस से संबंधित एक पत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें पांडुलिपियों के संबंध में लिखा गया था कि यदि संबंधित व्यक्ति जीवित लौट आए तो पांडुलिपियां वापस कर दी जाएं और यदि उसकी मृत्यु हो जाए तो उनका अपनी इच्छानुसार उपयोग किया जा सकता है। स्वामी जी ने कहा कि यह पत्र भी हमारे पास उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि इन ऐतिहासिक दस्तावेजों और साक्ष्यों को सामने लाना आवश्यक है।
मनुस्मृति के संदर्भ में उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी ऋषियों ने अपने-अपने कालखंड में अपने विचार व्यक्त किए हैं। ‘कलौ पराशर स्मृति’ की परंपरा को ध्यान में रखते हुए मनुस्मृति में संशोधन की बात हम सोचते भी नहीं हैं। हमारा प्रश्न यह है कि मनु और पितृसत्ता के नाम पर सनातन धर्म को कठघरे में खड़ा किया जाता है। जिस देश में नारी को शक्ति और देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, वहां नारी के प्रश्नों पर सनातन को घेरने के प्रयासों का उत्तर देना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि हिंदू समाज को बचाना है और सनातन की प्रतिष्ठा बनाए रखनी है, तो इन प्रश्नों का उत्तर प्रमाणों के साथ देना होगा। स्वामी जी ने श्रीकाशी विद्वत परिषद की अध्यक्षता और पूज्य आचार्यों के संरक्षण में एक समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि यह समिति सनातन परंपरा और संपूर्ण हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व करने वाली हो तथा सभी प्रकार के पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर कार्य करे। समिति अगले दो वर्षों में दुनिया के अलग-अलग देशों में उपलब्ध भारतीय बौद्धिक और सांस्कृतिक संपदा की पहचान करे तथा वहां रखी गई पांडुलिपियों को भारत वापस लाने के लिए प्रयास करे।
उन्होंने कहा कि भारत की अनेक पांडुलिपियां चीन, जर्मनी, फ्रांस और कनाडा में हैं। कुछ पांडुलिपियां कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी में हैं और कुछ रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन में उपलब्ध हैं। इन सभी पांडुलिपियों को वापस लाने के लिए संगठित प्रयास करना होगा। इस कार्य में आवश्यकता पड़ने पर भारत सरकार के पांडुलिपि मिशन का सहयोग भी लिया जाएगा। विदेश यात्राएं करने वाले संतों और आचार्यों से भी इस अभियान में सहयोग लिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि कुछ वामपंथी पत्रकारों और उनसे जुड़े कथित धर्माचार्यों द्वारा सनातन परंपरा के विरुद्ध किए जा रहे विमर्श का भी उत्तर देना आवश्यक है। उन्होंने कुछ धर्माचार्यों के आचरण पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि यदि धर्माचार्य ही विदेशी मिशनरियों के सामने अपना सिर झुकाते दिखाई देंगे, तो हिंदू समाज का विश्वास उन पर कैसे बना रहेगा? सनातन की आस्था और विश्वास को सुरक्षित रखने के लिए ऐसे विषयों पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।
स्वामी जी ने पुनः स्पष्ट किया कि हमारा विचार शास्त्रों में संशोधन का नहीं है। हमारा उद्देश्य दुनिया में हिंदू धर्मशास्त्रों में की गई कथित मिलावट, फर्जी ग्रंथों को मूल शास्त्रों के रूप में प्रस्तुत किए जाने और मूल पांडुलिपियों की चोरी का पर्दाफाश करना है। उन्होंने कहा कि इन कथित प्रक्षेपों की आड़ में ब्राह्मणों को गालियां दी जा रही हैं। अब इस पूरे विषय का पटाक्षेप होना आवश्यक है। यह समय की और धर्म की मांग है। उन्होंने कहा कि संस्कृति संसद का इस बार का केंद्रीय विषय भी इसी महत्वपूर्ण प्रश्न से जुड़ा है। भारतीय ज्ञान परंपरा, धर्मशास्त्रों और सनातन की बौद्धिक संपदा के संरक्षण के लिए संत समाज और विद्वानों को एकजुट होकर कार्य करना होगा। अंत में उन्होंने कुछ संतों और प्रोफेसर रामनारायण द्विवेदी से इस विषय पर अपने विचार रखने का आग्रह किया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here