
रघु ठाकुर
नई दिल्ली। 27 फरवरी 26 को दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल, उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया आदि को ईडी के द्वारा दायर प्रकरण पर चार्ज लगाने के पूर्व ही मुक्त कर दिया। अदालत ने अपने लंबे आदेश में ईडी के द्वारा प्रस्तुत प्रकरण की खामियों पर चर्चा की तथा उसने कहा कि ईडी के पास न तो प्रमाण हैं और न ही वह प्रमाणिक ढंग से आरोप सिद्ध कर सकी है। इस घटना ने फि र एक बार ईडी को कठघरे में खड़ा किया है। वैसे भी पिछले दिनों जो प्रकरण ईडी ने दायर किये और राजनैतिक नेताओं व लोगों को लंबे समय तक जेल में रखा, वे अधिकांश सिद्ध नहीं पाये गये। हालात इतने बदतर हैं कि ईडी के द्वारा बनाये गये प्रकरणों में मुश्किल से तीन प्रतिशत प्रकरणों में ही आरोपियों को दंडित किया जा सका है,वो भी छोटे-मोटे अधिकारी, कर्मचारियों को। राजनेताओं में तो शायद ही कोई ऐसा दुर्भाग्यशाली रहा हो जिसे ईडी, सीबीआई की विशेष अदालत ने दंडित किया हो, कम से कम मेरी जानकारी में तो नही है।

इसके पूर्व भी हेमंत सोरेने मुख्यमंत्री झारखंड, ए.राजा (डीएमके) और ऐसे ही अनेक नाम लिये जा सकते हैं जिनमें कई-कई माह तक राजनेताओं को जेल में डाला गया, कई के राजनैतिक कैरियर नष्ट हो गये और उन्हें अनावश्यक सार्वजनिक और राजनैतिक जीवन में अपमानित व लज्जित होना पड़ा और अंत में ईडी,सीबीआई के मुकदमे खारिज हो गये। हालांकि यह भी आश्चर्यजनक है कि इसी सीबीआई के जज जितेन्द्र सिंह सिंह ,जिन्होंने अब यह फैसला दिया है, हालांकि वे ही लगातार इन आरोपियों के जमानत आवेदनों को निरस्त भी करते रहे और ईडी को रिमांड देते रहे, जिससे इन आरोपियों अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसौदिया या इसके पहले संजय सिंह को इसी प्रकार लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा था। होना तो यह चाहिए कि ऐसे गंभीर मामलों में यह कानून बने कि ईडी को या सीबीआई को व्यक्ति गिरफ्तार करते ही और कोर्ट में पेश करते ही चार्ज शीट पेश करने की अनिवार्यता हो। ताकि न्यायालय चार्ज लगाते समय प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर प्रमाणिक निर्णय कर सके और इन ईडी या सीबीआई जैसे संस्थानों को रिमांड मांगने की जरूरत ही न पड़े। कोई भी व्यक्ति जो बाद में निरपराध सिद्ध हो, उसे अनावश्यक जेल में न रहना पड़े।
हालांकि ऐसे राजनैतिक आरोपों का चलन पहले भी रहा है। वर्तमान भाजपा सरकार द्वारा नियंत्रित ईडी की कार्यवाही जो सिद्ध नहीं हुई जिसके कारण दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री को जेल में रहना पड़ा और इस्तीफ ा भी देना पड़ा था। बाद में चुनाव में उनकी सरकार भी चली गई। पूर्व में अरविन्द केजरीवाल की संस्था इंडिया अगेंस्ट करप्शन्य की ओर से स्व. डॉ मनमोहन सिंह की सरकार के समय 2 जी स्पेक्ट्रम के घोटाले की बात कही गई थी उसमें 2 लाख करोड़ के घोटाले का आरोप लगाया गया था। इसी मामले में कई आईएएस अफसरों, मंत्री, राजा और द्रमुक नेता स्व. करूणानिधि की बेटी सांसद कनीमोझी को जेल में रहना पड़ा था और बाद में दोष भी सिद्ध नहीं हुआ। परंतु केन्द्र से स्व: मनमोहन की सरकार व दिल्ली से श्रीमती शीला दीक्षित की सरकार चली गई और अरविन्द केजरीवाल उससे लाभ उठाकर दिल्ली के मुख्यमंत्री बने तथा भाजपा ने उसका प्रचार कर बाद में दिल्ली में सरकार बनाई और नरेन्द्र मोदी उसके प्रधानमंत्री बने।
अगर उसके और पुराने इतिहास में जाएं तो स्व: राजीव गांधी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में, स्व: बी.पी. सिंह ने बोफोर्स घोटाले को उठाया व मुद्दा बनाया। बाद में राजीव गांधी की सरकार चली गई। स्वत: बी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बने परंतु कोई घोटाला सिद्ध नहीं हुआ और सभी आरोपी बरी हो गये। यहां तक कि स्व: अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में जब कारगिल में घुसपैठ हुई और इन घुसपैठियों को निकालने के लिये भारतीय सेना भेजी गई तो वही बोफोर्स तोपें कारगर साबित हुईं, और इनकी प्रशंसा हुई। इन घटनाओं से दो निष्कर्ष निकलते हैं, एक-आजकल राजनेता और कारपोरेट मिलकर अपने प्रतिद्वंद्वी को बदनाम करने, गिराने और राजनैतिक लाभ के लिये झूठे प्रकरण उठाते हैं। इसमें दुनिया की बड़ी-बड़ी कारपोरेट कंपनियों का अंतर युद्ध प्रमुख भूमिका अदा करता है। जिस कंपनी को ठेका नहीं मिल पाता वह कंपनी 500-1000 करोड़ रुपया ऐसे झूठे अभियानों पर खर्च करती और सुनियोजित मुहिम चलाती है, सरकार को गिराती व बनाती है और फिर सरकार बदलने के बाद, अपनी लागत की वसूली करती है व मुनाफा कमाती है। देश की जनता मीडिया के प्रचार में वह जाती है। इसका दूसरा कारण यह भी है कि राजनीति व राजनैतिक व्यक्तियों की साख आम जनता में इतनी गिर चुकी है कि उनके विरुद्ध लगाये गये प्रत्येक आरोप को देश सही मान लेता है। यह तो केवल गांधी ही है जिनके विरुद्ध लगभग 80 साल से देश की कुछ संस्थायें और पिछले 11-12 वर्षों से सरकार के संरक्षण में कानाफू सी, सोशल मीडिया, अखबारी बयान और हर प्रकार से झूठ व निंदा का अभियान चलाया जा रहा है, परंतु गांधी का सम्मान और सत्य शास्वत है।
भारतीय राजनीति व नेताओं को इस पर विचार करना चाहिए कि उनकी साख इतनी गिरी हुई और कमजोर क्यों है? अब यह सिद्ध हो चुका है और जनमानस में स्वीकार तथ्य हो चुका है कि ईडीध्सीबीआई जैसी संस्थायें जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने तोता कहा था वस्तुत: तोता ही है। वह तत्कालीन सरकार के अपने मालिकों की भाषा बोलते हैं। कटु सत्य तो यह है कि ईडी और सीबीआई की विश्वसनीयता आम जनमानस में समाप्त हो चुकी है। वह जिनके विरूद्ध कार्यवाही करते हैं उस पर सामान्य प्रतिक्रिया होती है तथा आम जनमानस में यह धारणा बनती है कि फं साया गया है। केंद्रीय जांच एजेंसियों की साख व प्रमाणिकता इतनी गिर चुकी है कि अब उनके किसी भी कार्यवाही को आम जन सत्ता के द्वारा की गई कार्यवाही ही मानता है। यहाँ तक कि अगर वह कोई सच कार्यवाही भी करेंगे तो भी वह आम जनमानस में झूठी मानी जायेगी। न्यायपालिका में अपने अभियोजन को सिद्ध करने की उनकी दर भी लगभग नगण्य है, याने मात्र तीन प्रतिशत। यहां तक की पुलिस जो बदनाम संस्था है, उसके अभियोजन की सफ लता दर ईडी, सीबीआई से कई गुना अधिक है।
अब यह भावना देश में बन रही है कि ईडी, सीबीआई जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों की उपयोगिता शून्य हो चुकी है और इन्हें समाप्त किया जाना चाहिए। चौथा प्रश्न आम जनमानस में है कि जब न्यायपालिका ईडी, सीबीआई पुलिस की कार्यवाही को न केवल गलत ठहराती है बल्कि उनकी विवेचना और अभियोजन में गंभीर त्रुटियां इंगित करती है जिससे आरोपित अपराधी निर्दोष बरी होते हैं, तो न्यायपालिका इन जिम्मेवार अधिकारियों के विरुद्ध झूठे अभियोजन और पीडि़त पक्षकारों को क्षतिपूर्ति के लिये आदेश क्यों नहीं करती ? ऐसे गैर जिम्मेवार और सत्ता निष्ठा वाले अधिकारियों को तो बर्खास्त कर देना चाहिए जिन्होंने न केवल झूठे प्रकरण बनाये या किसी को बचाने के लिये दबाने का अपराध किया है। यह समाचार पत्रों में समाचार आये है कि ईडी दिल्ली हाईकोर्ट में अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की चार्ज फ्रेम के पूर्व रिहाई के विरुद्ध अपील करने की तैयारी में है। संभव है कि अपनी साख बचाने के लिये वह अपील करे और एक रूटीन प्रक्रिया में उच्च न्यायालय स्थगन दे दें तथा ईडी, सीबीआई को अपनी फौरी साख बचाने और अपराध के लिये छिपाने के लिये अवसर मिल जाये।
1990 में हवाला कांड हुआ था जिसमें दानदाताओं ने एक साथ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, जे.के .एल.एफ . के मुखिया अमानउल्ला खान, और अन्य अनेक सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों को पैसे दिए थे और उन सभी पर आरोप लगे थे। यहां तक कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश स्व: जे. एस. वर्मा के बड़े-बड़े बयान अखबारों व पत्रिकाओं में उन दिनों छपते थे जिनमें कहा जाता था कि मैं स्वतरू इसका निरीक्षण करूंगा, उनकी निगरानी में जांच व कार्यवाही होगी। यहां तक कि उन्होंने कहा कि इस कांड के आरोपों से मुझे रात में नींद नहीं आती और अनेक लोगों के खिलाफ प्रकरण दर्ज हुए। यह प्रकरण जिस डायरी की सूची के आधार पर दर्ज हुए थे हमारे देश की महान जांच एजेंसी सीबीआई उसके बारे में कोई प्रमाण नहीं जुटा पाई और जिस प्रकरण की जांच की निगरानी भारत के मुख्य न्यायाधीश व्यक्तिगत रूप से कर रहे थे ।उस प्रकरण को एक जिला स्तर के जज ने यह लिखकर समाप्त कर दिया कि अकेले डायरी कोई साक्ष्य नहीं होती जब तक कि कोई अन्य उसकी पुष्टि न करे। याने भारत के मुख्य न्यायाधीश को, सर्वोच्च अदालत को इस नजीर का पता नहीं था कि अकेले डायरी प्रमाण नहीं मानी जाती। कुल मिलाकर देश की सरकारें, जांच एजेंसियां और कुछ हद तक न्यायपालिका भी आम जनमानस में विश्वसनीयता खो चुकी है, यह गंभीर चिंता का विषय है।
मैं समझता हूं कि अब भारत सरकार को
1. सीबीआईध्ईडी जैसी जांच एजेंसियों को या तो समाप्त कर देना चाहिए या उन्हें निष्पक्ष और उत्तरदायी बनाने के लिये चयन प्रक्रिया और काम की आजादी के प्रावधान करना चाहिये।
2. जहां भी न्यायपालिका अपने निर्णय में पुलिस या जांच एजेंसियों को आरोपित करती है वहां संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा दर्ज होना चाहिए और पीडि़त पक्ष का उनके वेतन राशि या जमा निधि से हर्जाना दिलाने का कानून बनना चाहिए, और आरोपकर्ताओं को राजनैतिक अधिकारों से डिसक्वालिफाई किया जाना चाहिए। एक जनचर्चा यह भी है कि ईडी अदालत के इस निर्णय के पीछे चुनावी राजनीति है। मैं इसके बारे में आज प्रमाणिक तौर पर कुछ नहीं कह सकता हूँ, परंतु यह भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है जिस पर विचार होना चाहिए।











