हरक सिंह रावत पर दुष्कर्म के आरोप, पुरानी CBI जांच पर सवाल और बेटे के DNA टेस्ट की मांग

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23 साल पुराना जेनी प्रकरण फिर सुर्खियों में

  प्रतीक पाठक

Jenny Kand of Dehradun : उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर 23 साल पुराना जेनी प्रकरण चर्चा के केंद्र में है। कभी तत्कालीन कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत के इस्तीफे की वजह बना यह मामला अब नए आरोपोंए पुराने जांच रिकॉर्ड और बेटे की पहचान के सवाल के साथ फिर सामने आया है। असम की रहने वाली इंदिरा देवड़ी उर्फ जेनी ने 7 नवंबर 2026 को देहरादून में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर हरक सिंह रावत पर दुष्कर्म, यौन शोषण और मानसिक प्रताडऩा के गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने पुराने मामले की दोबारा सीबीआई जांचए अपने 23 वर्षीय बेटे का डीएनए परीक्षण और न्याय की मांग की है। दूसरी ओर हरक सिंह रावत इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे भाजपा की राजनीतिक साजिश बता रहे हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ आरोप और जवाब का नहीं, बल्कि 23 साल पहले हुई जांचए उसकी प्रक्रिया और अब उठ रहे नए सवालों का भी है।

नारायण दत्त तिवारी सरकार में उठा था मामला, मंत्री को देना पड़ा था इस्तीफा

जेनी प्रकरण की शुरुआत वर्ष 2002.03 के दौरान हुई। असम की रहने वाली इंदिरा देवड़ी उर्फ जेनी काम की तलाश में देहरादून पहुंची थीं। उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के अनुसारए वह अक्टूबर अथवा दिसंबर 2002 में देहरादून आई थीं। जेनी के वर्तमान दावे के मुताबिक उस समय उनकी उम्र महज 16 साल थी। उन्होंने बताया कि वह देहरादून में एक एसटीडी बूथ पर काम करती थीं। इसी दौरान एक व्यक्ति उन्हें तत्कालीन राजस्व मंत्री हरक सिंह रावत के आवास तक लेकर गया। जेनी का आरोप है कि उन्हें यमुना कॉलोनी स्थित हरक सिंह रावत के आवास पर करीब डेढ़ से दो महीने तक रखा गया। उनका कहना है कि इसी दौरान उनके साथ यौन शोषण और दुष्कर्म हुआ। हालांकि उस समय सामने आए मामले में भी उन्होंने बच्चे का पिता हरक सिंह रावत को ही बताया था। जून 2003 में जेनी ने देहरादून के सरकारी अस्पताल में एक बच्चे को जन्म दिया। इसके बाद यह मामला उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा विवाद बन गया। उस समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री थे। हरक सिंह रावत तत्कालीन सरकार में राजस्व मंत्री थे। 18 जून 2003 को यह मामला उत्तरांचल विधानसभा में उठा। विपक्ष ने सरकार को घेरा और मंत्री की भूमिका पर सवाल खड़े किए। विवाद बढऩे के बाद हरक सिंह रावत ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने उस समय घोषणा की थी कि जब तक वह आरोपों से बेदाग साबित नहीं होंगे, विधानसभा में प्रवेश नहीं करेंगे।

सीबीआई जांच, डीएनए परीक्षण और क्लीन चिट

मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने सीबीआई जांच की संस्तुति की। जुलाई 2003 में सीबीआई ने मामले की जांच शुरू की। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 12 जुलाई को प्रारंभिक जांच शुरू हुई और 23 जुलाई को जेनी के आरोपों के आधार पर हरक सिंह रावत के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। जांच के दौरान बच्चे और हरक सिंह रावत के डीएनए नमूनों का परीक्षण कराया गया। उस समय आई रिपोर्टों के अनुसार, दोनों के नमूनों का मिलान नहीं हुआ। इसी आधार पर हरक सिंह रावत को क्लीन चिट मिली और सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की। हरक सिंह रावत का भी लगातार यही कहना रहा कि जांच में वह निर्दोष साबित हुए और मामले को कानूनी रूप से बंद कर दिया गया। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि वर्ष 2003 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार थीए जबकि उत्तराखंड में कांग्रेस की नारायण दत्त तिवारी सरकार थी। मौजूदा विवाद में हरक सिंह रावत इसी तथ्य का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि सीबीआई की जांच भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के समय हुई थी और उन्हें क्लीन चिट मिली थी।

2016 में फिर उठा मामला, हरीश रावत सरकार के दौरान भी हुई थी हलचल

करीब 13 साल तक शांत रहने के बाद वर्ष 2016 में जेनी एक बार फिर चर्चा में आईं। उस समय उत्तराखंड में कांग्रेस की हरीश रावत सरकार थी। जेनी ने आरोप लगाया कि उन्हें हरक सिंह रावत के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनके सहयोगियों की ओर से उकसाया गया था। इस दौरान हरीश रावत के निजी सचिव कमल सिंह रावत की ओर से जेनी के खिलाफ देहरादून कोतवाली में शिकायत दर्ज कराई गई। जेनी की तलाश और उनके पते को लेकर भी पुलिस स्तर पर सवाल उठे। रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली में दिया गया उनका पता सही नहीं मिला और मोबाइल नंबर भी किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर दर्ज बताया गया। इस घटनाक्रम के बाद मामला एक बार फिर ठंडे बस्ते में चला गया। हालांकि 2016 का यह अध्याय इस बात को दिखाता है कि जेनी प्रकरण केवल व्यक्तिगत आरोपों तक सीमित नहीं रहाए बल्कि अलग-अलग राजनीतिक दौर में इसका इस्तेमाल एक- दूसरे पर हमले के लिए भी होता रहा।

2026 में कैसे फिर चर्चा में आया जेनी प्रकरण!

वर्ष 2026 में अंकिता भंडारी प्रकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक आरोप- प्रत्यारोप तेज हुए। इसी दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए जेनी प्रकरण का उल्लेख किया। इसके बाद हरक सिंह रावत और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के बीच भी बयानबाजी हुई। महेंद्र भट्ट के बयान के जवाब में हरक सिंह रावत ने डीएनए जांच को लेकर पलटवार किया। इसी बीच जेनी ने एक वीडियो जारी कर नेताओं से उनके नाम पर राजनीति बंद करने की अपील की। उन्होंने कहा कि जिस मामले को लेकर नेता एक-दूसरे पर बयान दे रहे हैं, उसमें किसी ने उनसे यह जानने की कोशिश नहीं की कि उस समय उनके साथ क्या हुआ था। इसके बाद 7 नवंबर 2026 को जेनी देहरादून पहुंचीं और प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पहली बार विस्तार से अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखी।

जेनी के नए आरोपर- नाबालिग होने से लेकर मानसिक प्रताडऩा तक के दावे

प्रेस कॉन्फ्रेंस में जेनी ने दावा किया कि वर्ष 2002-03 में जब वह देहरादून आई थीं, तब उनकी उम्र महज 16 साल थी। उनका कहना है कि एक एसटीडी बूथ पर काम करने के दौरान एक व्यक्ति उन्हें हरक सिंह रावत के आवास पर लेकर गया था। वहां करीब डेढ़ से दो महीने रहने के दौरान उनके साथ कई बार दुष्कर्म और यौन शोषण किया गया। जेनी ने यह भी आरोप लगाया कि गर्भवती होने के बाद उन्हें मानसिक रूप से प्रताडि़त किया गया और छात्रावास में रखने के नाम पर नारी निकेतन में ऐसे लोगों के बीच रखा गया, जिन्हें मानसिक रूप से अस्वस्थ बताया जाता था। उन्होंने दावा किया कि उस समय उन्हें हिंदी भाषा की पर्याप्त समझ नहीं थी और इसी का फायदा उठाकर उनसे कई दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए। जेनी ने पुराने सीबीआई जांच रिकॉर्ड पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि सीबीआई अधिकारी उनसे मिलने केवल एक बार आए थे और जांच के दौरान उनके बेटे का रक्त नमूना नहीं लिया गया। ऐसे में वह जानना चाहती हैं कि आखिर डीएनए परीक्षण किसके नमूनों के आधार पर किया गया था! उन्होंने मांग की कि पूरे प्रकरण की नए सिरे से सीबीआई जांच कराई जाए, उनके बेटे का डीएनए परीक्षण हो और जरूरत पडऩे पर नार्को टेस्ट भी कराया जाए। जेनी का कहना है कि उनका बेटा अब 23 साल का हो चुका है और वह उसे पिता की पहचान दिलाना चाहती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अपने बेटे के लिए किसी आर्थिक मदद से ज्यादा उसकी पहचान और न्याय की जरूरत है।

हरक सिंह रावत का पलटवारर- भाजपा की राजनीतिक साजिश बताया

जेनी के आरोपों पर हरक सिंह रावत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपना पक्ष रखा। उन्होंने सभी आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि यह भाजपा की राजनीतिक साजिश है। उनके अनुसारए अंकिता भंडारी प्रकरण और कांग्रेस के राजनीतिक कार्यक्रमों से ध्यान हटाने के लिए 23 साल पुराने मामले को फिर से उठाया जा रहा है। हरक सिंह रावत का कहना है कि वर्ष 2003 में सीबीआई ने मामले की जांच की थी और डीएनए परीक्षण में बच्चे के नमूने उनसे मेल नहीं खाते थे। इसके बाद उन्हें क्लीन चिट मिली और अदालत में क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार किया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि उस समय जेनी को उनके आवास पर केवल दो दिन रखा गया था और उन्होंने स्वयं उससे मुलाकात तक नहीं की थी। उनके मुताबिक, एक व्यक्ति उनके पास नौकरी के सिलसिले में आया था और उन्होंने उसे नौकरी दिलाने के लिए कहा था। उन्होंने जांच में कुछ अन्य लोगों की भूमिका का भी उल्लेख किया। हरक सिंह रावत ने पुराने मामले में भाजपा नेताओं की भूमिका का जिक्र करते हुए कहा कि जिस समय सीबीआई जांच हुई, उस समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। ऐसे में अब उसी जांच पर सवाल उठाना तत्कालीन केंद्र सरकार और न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाने जैसा है। उन्होंने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को राजनीतिक बदनामी का प्रयास बताते हुए मानहानि की कार्रवाई की चेतावनी भी दी है।

डीजीपी से शिकायत- पुलिस ने सीओ डोईवाला को सौंपी जांच

प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद जेनी ने उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक दीपम सेठ से मुलाकात कर लिखित शिकायत सौंपी। उन्होंने हरक सिंह रावत के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने, मामले की निष्पक्ष जांच कराने और अपने बेटे का डीएनए परीक्षण कराने की मांग की। शिकायत मिलने के बाद पुलिस मुख्यालय ने प्रार्थना पत्र देहरादून पुलिस को भेज दिया। देहरादून के एसएसपी प्रमेन्द्र सिंह डोबाल ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जांच की जिम्मेदारी क्षेत्राधिकारी डोईवाला वंदना वर्मा को सौंपी है। उन्हें शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच कर तथ्यों के आधार पर आवश्यक कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। फिलहाल पुलिस स्तर पर शिकायत की जांच शुरू हुई है। अभी इसे दोबारा शुरू हुई सीबीआई जांच या दर्ज हो चुकी नई एफआईआर के रूप में देखना सही नहीं होगा। पुराने मामले में अब कौन से सवाल सबसे अहम हैं! जेनी प्रकरण के दोबारा सामने आने के बाद कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े हो गए हैं।

1-   वर्ष 2003 की सीबीआई जांच की प्रक्रिया को लेकर है। यदि उस समय डीएनए परीक्षण कराया गया था तो उसके मूल रिकॉर्ड, नमूने लेने की प्रक्रिया और फॉरेंसिक रिपोर्ट को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए।

2- यह है कि जेनी के नए दावों के अनुसार यदि उनके बेटे का नमूना नहीं लिया गया था तो पुराने परीक्षण में किसका नमूना इस्तेमाल किया गया था! इसका जवाब पुराने जांच रिकॉर्ड और मेडिकल दस्तावेजों से ही मिल सकता है।

3-  जेनी की उम्र, नारी निकेतन में रहने की परिस्थितियों और उस समय तैयार किए गए दस्तावेजों को लेकर है। इन सभी दावों की स्वतंत्र जांच और अभिलेखों का सत्यापन जरूरी है।

4-  23 साल पुराने मामले में कानूनी कार्रवाई की संभावनाओं का है। सीबीआई की पुरानी क्लोजर रिपोर्ट और अदालत की कार्यवाही को देखते हुए दोबारा जांच का रास्ता क्या होगा, यह संबंधित कानूनी प्रक्रिया और अदालत के आदेशों पर निर्भर करेगा। वहीं पितृत्व स्थापित करने के लिए डीएनए परीक्षण भी उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही कराया जा सकता है।

राजनीति, जांच और एक बेटे की पहचान के बीच उलझा मामला जेनी प्रकरण को केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित करके देखना भी इस मामले के एक महत्वपूर्ण पहलू को नजर अंदाज करना होगा। एक तरफ 23 साल पुरानी सीबीआई जांच और उससे मिली क्लीन चिट का हवाला देकर हरक सिंह रावत अपनी सफाई दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ जेनी उसी जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए नए सिरे से न्याय की मांग कर रही हैं। इस पूरे प्रकरण में एक 23 वर्षीय युवक की पहचान का सवाल भी जुड़ा हुआ है। हालांकि पितृत्व का निर्धारण राजनीतिक बयानों से नहीं, बल्कि विश्वसनीय साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया से ही हो सकता है।

अब देखना यह होगा कि देहरादून पुलिस की जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं ! क्या पुराने सीबीआई रिकॉर्ड की नए सिरे से पड़ताल होगी ! क्या अदालत के समक्ष दोबारा जांच की मांग पहुंचेगीघ् और क्या डीएनए परीक्षण से इस विवाद पर कोई निर्णायक स्थिति बन पाएगी ! 23 साल पहले जिस मामले ने उत्तराखंड की राजनीति में मंत्री का इस्तीफा कराया थाए वह आज फिर उसी राज्य की सियासत में चर्चा का विषय है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सवालों के केंद्र में पुरानी राजनीतिक लड़ाई के साथ.साथ एक महिला के नए आरोप, जांच की विश्वसनीयता और एक बेटे की पहचान भी है। फिलहाल आरोपों की सच्चाई जांच का विषय है। किसी भी पक्ष को दोषी या निर्दोष ठहराने का अंतिम आधार राजनीतिक बयान नहींए बल्कि जांच के निष्कर्ष और न्यायिक प्रक्रिया ही होंगे।

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