मायानगरी की चकाचौंध और फिल्मी सच …

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    अतुल तिवारी

The glitz of the city of dreams: सपनों का शहर या संघर्ष का मैदान! मुंबई। मुंबई, जिसे हम प्यार से मायानगरी कहते हैं। भारत के लाखों युवाओं के लिए एक सपना है। यहां की चमक-दमक, बड़े सितारों की लाइफ स्टाइल और फिल्मों की दुनिया, बाहर से जितनी आकर्षक दिखती है, अंदर से उतनी ही जटिल और चुनौतीपूर्ण होती है। बॉलीवुड सिर्फ एक इंडस्ट्री नहीं, बल्कि एक इकोसिस्टम है। जहां पैसा, पावर, क्रिएटिविटी, राजनीति और भावनाएं, सब एक साथ काम करते हैं।

सपनों की एंट्री-  शुरुआत ही सबसे कठिन- मुंबई में कदम रखते ही असली कहानी शुरू होती है।हर दिन सैकड़ों ऑडिशन होते हैं, लेकिन सिलेक्शन बहुत कम लोगों का होता है… एक नए कलाकार को रोज़ पांच से 10 ऑडिशन देने पड़ सकते हैं। रहने के लिए छोटे कमरे, अक्सर चार-पांच लोगों के साथ शेयर करना उनकी बेबसी होती है। पैसों की कमी, पार्ट- टाइम जॉब करना पड़ता है ताकि वे अपना पेट भर सकें…। यहां टैलेंट जरूरी है लेकिन अकेला काफी नहीं है। सही समय, सही मौका और सही लोगों तक पहुंचे,ये सबसे जरुरी हैं।

पैसा और पावर का खेल- फिल्म बनाना सिर्फ कला नहीं, एक बड़ा बिजऩेस है। एक मिड- बजट फिल्म भी करोड़ों में बनती है। यहां क्या चलता है। प्रोडयूसर पैसा लगाते हैं इसलिए डिसीजन पॉवर उनके पास होती है। स्टार कॅास्ट के हिसाब से फिल्म का बजट तय होता है। कई बार कंटेंस से ज्यादा मार्केट वैल्यू को तवज्जो मिलता है। यानि, अच्छी कहानी होने के बावजूद, अगर उसमें बड़ा चेहरा नहीं है, तो फिल्म बनना मुश्किल हो जाता है।

स्टारडम- दिखावे और दबाव की दुनिया – स्टार बनना जितना मुश्किल है, स्टार बने रहना उससे भी ज्यादा कठिन है। स्टार लाइफ का सच ये है कि हर वक्त कैमरों की नजर सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और आलोचनाओं से भरी होती है। फिटनेस, लुक्स और इमेज को मेंटेन रखने का प्रेशर बना रहता है। शाहरुख खान जैसे सितारे आज जिस मुकाम पर हैं, वहां पहुंचने के लिए उन्होंने सालों तक संघर्ष किया। वहीं नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की जर्नी बताती है कि टैलेंट और किस्मत से भी रास्ता बन सकता है।

नेपोटिज़्म बनाम टैलेंट-  बॉलीवुड में नेपोटिज़्म एक बड़ा मुद्दा है। फिल्मी परिवारों से आने वाले लोगों को शुरुआत में आसानी से फिल्में मिलती है। लेकिन पूरी सच्चाई यह है कि इंट्री आसान हो सकती है, लेकिन टिकना मुश्किल होता है। दर्शक आज ज्यादा जागरुक हैं। अगर हीरो या हिरोईन का परफामेंस अच्छा नहीं, तो सेंकेंड भर में रिजेक्ट कर देती है। ओटीटी ने बाहरी व नये चेहरों को भी मौके दिए हैं,जिसकी वजह से फिल्मी परिवेश से बाहर से आने वाले टैलेंटेड युवक-युवतियों को शानदार मौका मिल रहा है।

असफलता और मानसिक दबाव- फिल्म इंडस्ट्री में असफलता बहुत मामूली बात है, लेकिन इसके बारे में खुलकर बातें कम होती है। सच्चाई ये है कि लगातार जिजेक्शन से से आत्मविश्वास टूटता है। फाइनेंसियल इनस्टेबिलिटी तनाव बढ़ाती है ,जिसकी वजह से अधिसंख्य नौजवान डिप्रेशन तक में चले जाते हैं। यह मायानगरी सिर्फ ड्रिम्स ही नहीं देती, बल्कि कई बार उन्हें तोड़ भी देती है।

ओटीटी और बदलती फिल्मी दुनिया -आज के समय में ओटीटी प्लेटफार्म ने पूरी इंडस्ट्री का गेम बदल दिया है। नए एक्टर और राइटर्स को मौका छोटे शहरों की कहानियां भी मेन स्ट्रीम में आने लगी है। अब स्क्सेस का मतलब सिर्फ बिग स्क्रीन नहीं, बल्कि डिजीटल प्रिसेंस भी है।

मायानगरी का सपना बनाम सच्चाई – मुंबई एक paradox है। यहां सब कुछ संभव है, लेकिन कुछ भी गारंटेड नहीं कि सफलता मिल ही जाये। दोनों पहलू साथ- साथ चलते हैं। Glamour vs Struggle, Money vs hard work,Fame vs Loneliness

निष्कर्ष- क्या सीख मिलती है मायानगरी की सच्चाई यह है कि  यह जगह  illusion reality का मिश्रण है। अगर आप यहां आना चाहते हैं, तो सिर्फ सपना नहीं प्लान भी होना चाहिए। टैलेंट के साथ धैर्य भी जरूरी है। रिजेक्शन को एक्सेप्ट करना सीखना होगा।

अंत में यही कहूंगा कि मायानगरी आपको वही देती है जो आप उससे लेने की क्षमता रखते हैं। लेकिन इसकी कीमत हमेशा आसान नहीं होती।

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