मणिपुर में फसाद पर विवाद

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यह ठीक है कि सरकारें बर्मा से नाजायज तौर पर आने वाले कूकी समुदाय को मणिपुर के पहाड़ों पर कब्जा करते देखती रही और सोई रही। चर्च चुपचाप जंगलों में चर्च व भवन बनाता रहा। लेकिन हाल ही में जो तूफान मणिपुर में उठा, उसका कारण क्या है? दरअसल मणिपुर उच्च न्यायालय ने मार्च 2023 में एक निर्णय दिया जिसमें मणिपुर सरकार को यह आदेश दिया गया कि वह केन्द्र सरकार को मैतेयी समुदाय को जनजाति का दर्जा देने की सिफारिश करे। इस सिफारिश का विरोध कूकी समुदाय ने किया। मणिपुर सरकार ने शायद पहली बार यह निर्णय किया था कि चुडाचांदपुर जिला के जंगलों में जो अवैध कब्जा बर्मा के कूकियों ने किया हुआ है, उसको मुक्त करवाया जाये। मुख्यमंत्री को चुडाचांदपुर जिला में किसी कार्यक्रम में भाग लेने के लिये जाना था तो उनका विरोध हुआ। मणिपुर में कूकी समुदाय और मैतेयी समुदाय के बीच का फसाद समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा। दंगे के पीछे का कारण जानने के लिये जरूरी है कि मणिपुर में दोनों के बीच के संबंध जान लिये जायें।

मणिपुर का क्षेत्रफल 22327 वर्ग किलोमीटर है। इनमें से घाटी का हिस्सा 10 प्रतिशत के लगभग है और शेष 90 फीसदी पहाड़ी क्षेत्र है। लेकिन राज्य की 60 प्रतिशत जनता घाटी में रहती है और शेष 40 प्रतिशत जनता पहाड़ में रहती है। घाटी में रहने वाले लोग मैतेयी कहे जाते हैं और वे आस्था से वैष्णव सम्प्रदाय को मानने वाले हैं। पहाड़ में कूकी और नागा दो समुदायों के लोग रहते हैं। इन दोनों समुदायों के लोगों को भारत सरकार ने जनजाति का दर्जा दिया हुआ है। जनजाति के समुदायों के लोगों की संस्कूति और आर्थिक हितों की रक्षा के लिये कानून है कि कोई भी मैतेयी पहाड़ में जमीन नहीं खरीद सकता। लेकिन कूकी व नागा समुदाय के लोग घाटी में जमीन खरीद सकते हैं। खाते-पीते परिवारों के कूकी और नागा इम्फाल में आकर बसते रहते हैं। वैसे भी पहाड़ का जीवन थोड़ा कठिन तो होता ही है। इसलिये यदि किसी के पास साधन हो जायें तो वह नीचे मैदान की ओर भागता है। इसी के चलते कूकी व नागा मैदान में आकर मकान बना लेते हैं। मणिपुर में मैदान का अर्थ इम्फाल है। जहां तक मजहब का ताल्लुक है, जैसा कि पहले लिखा गया है कि मैतेयी वैष्णव सम्प्रदाय के लोग हैं और इम्फाल में गोविन्द जी महाराज का मंदिर उनकी आस्था का सबसे बड़ा केन्द्र है। वैसे हर मैतेयी की इच्छा होती है कि जीवन में एक बार वृन्दावन के दर्शन अवश्य कर लिये जायें। जहां तक पहाड़ में रहने वाले कूकी और नागा समुदायों का मामला है, उनको ब्रिटिश काल में ही ईसाई मिशनरियों ने ईसाई मजहब में शामिल कर लिया था। अलबत्ता, स्वतंत्रता काल में कूकी समुदाय ने अंग्रेजों से सख्त टक्कर ली थी। यह अलग बात है कि कांग्रेस काल में आजादी का इतिहास लिखने वालों ने इसका नोटिस नहीं लिया। केवल रिकार्ड के लिये बता दिया जाये कि प्रदेश में मैतेयी 53 फीसदी, नागा 24 फीसदी और कूकी 16 प्रतिशत हैं।पहाड़ में रहने वाले कूकी और नागा समुदाय के लोगों का आपस में भीषण संघर्ष होता रहता है। उस संघर्ष में अनेक निर्दोष अपनी जान गंवाते हैं। लेकिन उसका एक दूसरा नुकसान भी होता है। जैसा कि ऊपर बताया गया है घाटी चारों ओर से पहाड़ों से घिरी हुई है। कूकी-नागा झगड़ों में वे घाटी की ओर आने वाली सडकों को रोक देते हैं जिसके कारण घाटी का दम घुटने लगता है। यहां घाटी का अर्थ मैतेयी से भी लिया जा सकता है। कूकी समुदाय में अनेक हथियारबन्द समूह सक्रिय रहते हैं जिनकी मांग रहती है कि उनके पहाड़ों को मणिपुर से हटा कर अलग प्रदेश बना दिया जाये। इनमें से कुछ समूह अलग प्रदेश की मांग करते हैं और कुछ अलग देश की मांग करते हैं। इसी प्रकार नागा समुदाय में भी ऐसे हथियारबन्द समूह सक्रिय हैं जिनका मानना है कि पहाड़ों का वह हिस्सा, जो नागा बहुल है, उसे मणिपुर से निकाल कर नागालैंड में शामिल किया जाए। इसकी मांग की पूर्ति के लिये भी हिंसक संघर्ष करते रहते हैं। स्वाभाविक है इन दोनों ही मांगों का विरोध मैतेयी करते हैं। पिछले कुछ समय से मैतेयी समुदाय ने एक दूसरी मांग जोर-शोर से उठाना शुरू कर दी है। वह मांग है कि मैतेयी को भी कू की और नागा की तरह जनजाति समुदाय का दर्जा दिया जाए। इस मांग का विरोध कूकी और नागा दोनों ही करते हैं।इस पूरे विवरण में एक मुद्दा और जोडऩ़ा जरूरी है। मणिपुर की सीमा म्यांमार यानी बर्मा से लगती है। म्यांमार का चिन प्रान्त या जिला मणिपुर के मोरेह इलाके से जुड़ता है। यह चिन जिला कूकी बहुल जिला है। यह भी कहा जा सकता है कि यह जिला ही कूकी समुदाय का है। दरअसल म्यांमार में जिस समुदाय को चिन कहा जाता है, भारत में उसी समुदाय को कूकी कहा जाता है। इसलिये कई बार इस समुदाय को चिन कूकी भी कहा जाता है। अब चाहे चिन कहिये या कूकी कहिए, लेकिन समस्या यह है कि बर्मा के ये चिन या कूकी भारत में आते रहते हैं। वे मणिपुर के चुडाचांदपुर जिला में आकर बसते हैं। राशन कार्ड और आधार कार्ड बन जाने के बाद मतदाता सूची में शामिल होने में भला कितनी देर लगती है? जंगल में पहले घर बनाते हैं, फिर चर्च का निर्माण होता है, कहने की जरूरत नहीं कि चर्च के लिये विदेशी मिशनरियां पैसा देती हैं। इस प्रकार मणिपुर के जंगलों में, जहां मणिपुर का मैतेयी पैर नहीं रख सकता, वहां म्यांमार का कूकी आकर घरबार बसा लेता है। शुद्ध बंगलादेशी मामला है। लेकिन यह सब समस्याएं तो मणिपुर की पुरानी हैं। यह ठीक है कि सरकारें बर्मा से नाजायज तौर पर आने वाले कूकी समुदाय को मणिपुर के पहाड़ों पर कब्जा करते देखती रही। चर्च चुपचाप जंगलों में चर्च व भवन बनाता रहा, लेकिन हाल ही में जो तूफान मणिपुर में उठा, उसका कारण क्या है? दरअसल मणिपुर उच्च न्यायालय ने मार्च 2023 में एक निर्णय दिया जिसमें मणिपुर सरकार को यह आदेश दिया गया कि वह केन्द्र सरकार को मैतेयी समुदाय को जनजाति का दर्जा देने की सिफारिश करे। इस सिफारिश का विरोध कूकी समुदाय ने किया। मणिपुर सरकार ने शायद पहली बार यह निर्णय किया था कि चुडाचांदपुर जिला के जंगलों में जो अवैध कब्जा बर्मा के कूकियों ने किया हुआ है, उसको मुक्त करवाया जाये। मुख्यमंत्री को चुडाचान्दपुर जिला में किसी कार्यक्रम में भाग लेने के लिये जाना था। कूकी समुदाय के लोगों ने पांडाल को आग के हवाले कर दिया। दूसरे दिन उसकी प्रतिक्रिया घाटी में हुयी। मैतेयी लोगों ने इम्फाल में कूकी समुदाय के लोगों के घरों को आग के हवाले कर दिया। देखते-देखते स्थिति यह हो गयी कि घाटी से कूकी समुदाय के लोग भगा दिये गये और पहाड़ में यदि कोई इक्का-दुक्का मैतेयी परिवार रहता था (कहीं-कहीं सरकारी कर्मचारी थे), तो यकीनन उस पर कहर टूटा। 70 से ज्यादा लोग मारे गये। हजारों लोग राहत शिविरों में पड़े हैं। कूकी समुदाय के लोग राजनीतिक मतभेद भुला कर अलग प्रशासन की मांग करने लगे। ईसाई मिशनरियां एक बार फिर सक्रिय हो गई हैं। दरअसल इतने लम्बे अरसे से ईसाई मिशनरियों ने पश्चिमी तथाकथित नृविज्ञानियों ने मणिपुर के विभिन्न

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